DEIEd Lekhan Shikshan Study Material Notes Previous Question Answer

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लेखन

श्रीधर मुकर्जी के अनुसार-संसार में मनुष्य दो प्रकार से ख्याति प्राप्त करता है, एक वक्ता दूसरा लेखक। वक्ता तो प्रायः अपने जीवनकाल में ही विशेष पूज्यनीय रहता है अर्थात् उसकी ख्याति जीवनकाल में होती है उसके बाद लोग उसे धीरे-धीरे भूलने लगते हैं, परन्तु लेखक का नाम अमर रहता है उसके पश्चात् भी लोग उसकी रचनाओं का अध्ययन करते हैं। और उसके भाव एवं विचारों का लाभ उठाते हैं।”

लेखन-कौशल का अर्थ

सामान्य रुप से लिखकर विचारों की अभिव्यक्ति करना लेखन कौशल या लिखित अभिव्यक्ति कहा जाता है।

श्री माँटेसरी का कथन है।

कि बालकों को पहले-पहल लिखना ही सिखाया जाए, क्योंकि यह वाचन की अपेक्षा सरल होता है।

लेखन कौशल का महत्त्व

भाषा पर अधिकार प्राप्ति के लिए जिस प्रकार किसी भाषा का सुनना, बोलना और पढ़ना महत्त्व रखता है उसी प्रकार लिखने का भी महत्त्व है। निम्नलिखित बिन्दुओं की सहायता से हम लेखन कौशल का महत्व जान सकते हैं

(1) दैनिक जीवन में उपयोगी-दैनिक कार्यों को सुचारु रुप से करने के लिए लिखित भाषा का प्रयोग जरुरी हैं। लिखित भाषा द्वारा ही घर तथा कार्यक्षेत्र में हिसाब का लेखा जोखा रखा जा सकता है।

(2) दर बैठे व्यक्ति से सम्बन्ध-लिखित भाषा द्वारा दूर बैठे व्यक्ति से पत्राचार द्वारा विचार-विमर्श किया जा सकता है। आधुनिक युग में हुए विकास के बाद भी अधिकतर लोग पत्राचार के माध्यम से ही अपने भावों व विचारों को सरलता से दूसरों तक पहुँचाते हैं।

(3) ज्ञानार्जन में सहायक-लिखित भाषा के माध्यम से प्रत्येक विषय का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। प्राचीन भाषा, साहित्य, इतिहास, विज्ञान आदि के ज्ञान को हम तक पहुँचाने का श्रेय लिखित भाषा को जाता है। ग्रन्थ, पाठ्यपुस्तक आदि इसके उदाहरण हैं।

(4) ज्ञान को स्थायी रखने में सहायक-प्रत्येक विषय को स्मरण रखना अध्यापक व विद्यार्थी के लिए असम्भव है। लेखन से ज्ञान को स्थायी रुप देकर विद्यार्थी प्रत्येक विषय की जानकारी प्राप्त करता है।

(5) भावी पीढ़ी के लिए ज्ञान का संरक्षण-भाषा का लिखित रुप ज्ञान प्राप्ति का सशक्त साधन है तथा ज्ञान का संरक्षण कर उसे भावी पीढ़ी तक पहुँचाता है। रामायण व महाभारत का

ज्ञान हम तक लिखित भाषा के माध्यम से ही पहुँच पाया है। लिपि की सहायता से हमारा हम तक ही सीमित ना रह कर भावी पीढ़ी तक भी पहुँचता है।

(6) अन्वेषण में सहायक-प्रत्येक क्षेत्र में अन्वेषण व खोज कार्य लिखित भाषा, निर्भर है। विज्ञान, भाषा, कला व अन्य कोई भी क्षेत्र की नई-नई खोजें, लेखन द्वारा स्पष्ट

जाती है।

(7) भावात्मक विकास-दुख-सुख जीवन के साथी हैं और व्यक्ति जब अपने हर्ष, शो जैसे भावों को कहानी, कविता, निबन्ध, पत्र आदि के रुप में लिखकर अभिव्यक्त करता है तो उसमें आत्मिक संतोष उत्पन्न होता है उससे व्यक्ति का भावात्मक विकास होता है।

(8) मूक व्यक्तियों के लिए-जो व्यक्ति बोल नहीं सकते उनके लिए लेखन वरदान सिः हुआ है। मौन व्रत की अवस्था में भी व्यक्ति लेखन द्वारा अपना कार्य व्यवहार कुशलता से चला सकता है।

(9) भाषा का विकास-जिस प्रकार भोजन की सहायता से व्यक्ति का शारीरिक विकास होता है, उसी प्रकार भाषा के लिखित रुप से भाषा का भी विकास होता है। लिखित भाषा के अभाव में हम साहित्य व शब्द भण्डार में वृद्धि की कल्पना भी नहीं कर सकते।

(10) समय का सदुपयोग-लेखन से व्यक्ति की सृजनात्मक शक्तियाँ विकसित होती हैं। तथा साहित्य रचना भी इसी पर निर्भर करती है। शारीरिक रुप से असमर्थ व्यक्ति लेखन की सहायता से अपना समय अच्छी तरह व्यतीत कर सकते हैं और विद्यार्थी अवकाश के समय का सदुपयोग कर साहित्य में अपना योगदान दे सकते हैं। |

(11) विषय व कार्य को प्रामाणिक रुप देने में सहायक-‘बीत गई सो बात गई’ यानि मौखिक रुप से किसी भी चीज का प्रभाव नहीं हो सकता। कानून व्यवस्था में विशेष कर लिखित रुप को ही प्रामाणिक मानते हैं।

(12) शिक्षण प्रक्रिया में सहायक-प्रत्येक विषय का ज्ञान मौखिक रुप से नहीं बताया जा सकता है और न ही विद्यार्थी उन्हें स्मरण कर सकता है। भाषा, गणित, विज्ञान आदि विषयों का ज्ञान मौखिक रुप से सम्भव नहीं। अतः लेखन आवश्यक हो जाता है।

(13) मूल्यांकन में सहायक-शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में विद्यार्थियों का मूल्यांकन अनिवार्य होत है। लिखित भाषा द्वारा कम समय में अधिक विद्यार्थियों की जाँच की जा सकती

(14) कार्यालयों व व्यापार क्षेत्र में सहायक।

(15) देश की विभिनन गतिविधियों की जानकारी।

(16) चरित्र निर्माण में सहायक।

लेखन कौशल के उद्देश्य

लेखन – कौशल के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए लेखन-कौशल की शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किए जा सकते हैं

1. लिपि सिखाने का उद्देश्य है कि विद्यार्थी अपने दैनिक जीवन के क्रिया-कलाप आसानी से कर सकें।

2. उसमें पत्राचार की योग्यता का विकास करना जिससे वह दूरस्थ व्यक्ति के साथ विचारों का आदान-प्रदान कर सकें।

3. लिखित भाषा ज्ञानार्जन को सशक्त माध्यम है। अतः विद्यार्थी में इसकी योग्यता विकसित करना।

4 लिखित भाषा शिक्षण से अपनी व अन्य सभ्यता संस्कृति से परिचित कराना।

5 लिपि भाषा का ज्ञान प्रदान कर विद्यार्थी को अन्वेषण के योग्य बनाना।

6. विद्यार्थी में चिन्तन, मनन की योग्यता विकसित कर उसका मानसिक विकास करना।

7. लेखन कार्य द्वारा सामाजिक सम्पर्क बनाने के योग्य बनाना।

8. लेखन द्वारा उन्हें समय का सदुपयोग करना सिखाना।

9. लिखित भाषा द्वारा व्याकरण शुद्धता का ज्ञान प्रदान करना।

10. लेखन शिक्षण द्वारा अध्यापन कार्य सरल बनाना।।

11. विद्यार्थियों में परीक्षा देने की योग्यता विकसित करना।

12. विद्यार्थियों को व्यापार क्षेत्र में कार्य करने के योग्य बनाना।।

13.विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों का विकास करना।

संक्षेप में कह सकते हैं कि लिखित भाषा द्वारा हम जीवन के अधिकांश कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं तथा शिक्षण प्रक्रिया लिखित भाषा पर ही निर्भर है।

लिपि शिक्षण की विधियाँ

भाषा के चार कौशल सुनना, बोलना, पढ़ना व लिखना में लेखन तीन कौशलों के उपरान्त आता है। भाषा शिक्षण प्रक्रिया में यह क्रम इसी प्रकार आता है। यह एक स्वाभाविक क्रम है।

वर्गों की रचना सिखाने के लिए अध्यापक अनुलिखित विधियाँ अपना सकता है।

(1) रुपरेखानुकरण विधि – इस विधि में शिक्षक अभ्यास पुस्तिका, श्यामपट्ट या स्लेट पर चाक या पेंसिल से बिन्दु बनाते हुए शब्द या वाक्य लिख देता है और छात्रों से उन निशानों पर पेंसिल या चाक फेरने को कहता है, जिससे शब्द या वाक्य उभर आएँ इस से अभ्यास करते-करते वह वर्गों को लिखना सीख जाता है।

(2) स्वतन्त्र अनुकरण विधि – इसमें अध्यापक श्यामपट्ट, कापी या स्लेट पर अक्षरों को लिख देता है और छात्रों को कहता है कि उन अक्षरों को देखकर उनके नीचे स्वयं उसी प्रकार अक्षर बनाए।

 (3) माँटेसरी विधि – मॉण्टेसरी ने लिखाना सिखाने के लिए आँख, कान और हाथ तीनों के प्रयोग पर बल दिया है। इस के अनुसार बालकों को पहले लकड़ी अथवा गत्ते पर बने अक्षरों पर उगली फेरने को कहना चाहिए और फिर पेंसिल को उन्हीं अक्षरों पर घूमाना चाहिए। पेंसिल प्रायः रंगीन होती है। इस प्रकार अक्षरों के स्वरुप से परिचित होकर उन्हें लिखना सिख जाते हैं।

(4) संश्लेषणात्मक विधि – इसे रेखा विधि भी कहा जाता है। देवनागरी लिपि के सभी वर्ण रेखाओं तथा वृत्तों से बनते हैं। इस विधि में शुरु से बच्चे को विभिन्न प्रकार की रेखाएँ खींचने का अभ्यास कराया जाता है। जैसे खड़ी रखा, पड़ी रेखा, तिरछी रेखा, अर्द्ध वृत्त, पूर्ण वृत्त आदि। फिर रेखाओं को मिलाकर वर्ण रचना सिखाई जाती है। जैसे ‘न’ सिखाना हो तो पहले एक खड़ी रेखा (1) फिर बीच में एक पड़ी रेखा, उसके पश्चात् पड़ी रेखा के बाएं सिरे पर गोलाई ‘न’।

(5) तुलना विधि – हिन्दी भाषी क्षेत्रों में तुलना विधि उपयोगी मानी जाती है। बालक को तीसरी चौथी कक्षा में मातृभाषा के लेखन का अभ्यास हो चुका होता है। अतः उससे तुलना करते हुए हिन्दी भाषा शीघ्रता से सीखी जा सकती है।

| प्रत्येक विधि को अगर हम ध्यानपूर्वक देखें तो उसमें गुणों के साथ-साथ अवगुण भी होंगे अतः उपरोक्त किसी एक विधि का अनुसरण करना लाभकारी नहीं होगा। छात्रों की आवश्यता व मानसिक स्तर को देखते हुए जो विधि जहाँ उपयुक्त लगे उसका प्रयोग करना चाहिए। विभिन्न विधियों का उचित प्रयोग अध्यापक की कुशलता पर भी निर्भर करता है।

लेखन कौशल में अशुद्धियाँ और उनका समाधान

लिखने की शिक्षा पढ़ने के बाद दी जानी चाहिए क्योंकि लिखने की शिक्षा बालक को तभी दी जाये जब उसकी माँसपेशियाँ मजबूत हो जायें। सर्वप्रथम शिक्षक को बालक को

चित्रकारी करने की स्वतन्त्रता देनी चाहिए, चित्रकारी के द्वारा ही बालक लिखना सीखते हैं। चित्रकारी लिखने की पहली सीढ़ी है।

लेखन शिक्षण के लिए शिक्षक को कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए तभी वह बालक को अच्छी प्रकार से लिखना सिखा सकता है।

लेखन शिक्षण के लिए आवश्यक बातें

ये बातें निम्नलिखित हैं

1. बालक को लिखना तभी सिखायें जब वह लिखने में रुचि ले।।

2. अक्षरों को सरल से कठिन के क्रम में लिखना सिखाया जाये जैसे-प, व, र, भे आदि अक्षर पहले क्ष, त्र, ज्ञ आदि कठिन अक्षर बाद में। वाक्य भी सरल से कठिन की ओर सूत्र के आधार पर लिखने सिखाये जायें। |

3. अध्यापक को चाहिए कि वह बालक के लिखने की गति पर प्रारम्भ में ध्यान न देकर अक्षरों, शब्दों और वाक्यों की शुद्धता पर ध्यान दे।

4. प्रारम्भ में अक्षरों का आकार बड़ा होना चाहिए धीरे-धीरे अक्षरों के आकार छोटे किये जायें।

5. बालक के मन में लिखने के प्रति उदासीनता नहीं होनी चाहिए।

6. लिखना सिखाते समय बालक की व्यक्तिगत् विभिन्नता पर ध्यान देना चाहिए। सभी बालक एक सा नहीं लिख सकते।

7. लेखन कार्य पढ़े हुए अंश से सिखाना चाहिए। बालक पढ़ी हुई बात को आसानी से लिख लेते हैं।

भाषा शिक्षण में लिखना सिखाना महत्त्वपूर्ण अंग है। लेखन का शुद्ध होना भी आवश्यक है, अशुद्ध लेखन का प्रभाव पाठक पर अच्छा नहीं होता। शुद्ध लेखन के लिए निम्न बातों पर विचार करते हैं।

  • अशुद्धियों के प्रकार ।

(ii)    अशुद्धियों के कारण

  • अशुद्धियों का निराकरण या समाधान।

किसी भी बात को कहने की अपेक्षा लिखने को अधिक स्थायी माना जाता है। किसी भी संवाद, उपन्यास, नाटक, कविता, कहानी आदि को लिखने की कला पाठक को अपनी तरफ आकर्षित करती है। निबन्ध लेखन, कहानी लेखन, पत्र लेखन, आत्मकथा लेखन आदि लिखित अभिव्यक्तियों के साधन हैं।

लिखित अभिव्यक्ति के उद्देश्य

1. विषयानुकूल भाषा शैली का प्रयोग करना सीखना।

2. बच्चों को वर्णो की ठीक-ठीक बनावट लिखना सीखना।

3. वाक्यरचना के नियमों से परिचित कराना।

4. शुद्ध और सुडौल अक्षर विन्यास का ज्ञान कराना।

5. सुन्दर और सुडौल लेखन का अभ्यास करना।

6. अपने विचारों को अनुच्छेदों में लिखकर व्यक्त करना।

7. अपने अनुभवों को लिखने की योग्यता को विकसित करना।

8. साहित्य के प्रति रुचि जागृत करना।

9. मौलिक रचना करने योग्य बनना।।

कक्षा में पढ़ाई गई विषय-वस्त को छात्र-छात्राएं अच्छी तरह जान गए अथवा नहीं। कोई भी चढाई गयी विषय-वस्तु छात्रों की समझ में आयी या नहीं। जो ज्ञान उन्होंने कक्षा में प्राप्त किया है का उपयोग आवश्यकतानुसार जीवन में कर सकते हैं या नहीं और भी ऐसी शिक्षा की जांच के | लिए दिए गये प्रश्नों को जब वे छात्र या छात्रायें हल करते हैं तो उनके द्वारा किया गया कार्य लिखित कार्य कहलाता है।

लिखित अभिव्यक्ति के महत्व

  • भाषा के दो रूप होते हैं – मौखिक और लिखित
  • भाषा पर पूर्ण अधिकार करने की दृष्टि से लेखन कौशल का विकास आवश्यक होता है।
  • मनुष्य के अनुभवों, कल्पना शक्ति का भण्डार लिखित भाषा द्वारा ही चिरकाल से संचित होता रहा है।
  • लेखन एक स्वतंत्र व्यवसाय के रूप में भी मानव जाति का कल्याण कर रहा है।
  • देश-विदेश में हो रहे ज्ञान-विज्ञान आदि में परिचित कराने का मुख्य साधन लिखित भाषा ही है।

सीखने में ध्यान रखने योग्य बातें-बैठने का ढंग

ध्यान रखने योग्य बातें :

1. जो कुछ भी लिखा जाये वह सुन्दर और आकर्षित होना चाहिए।

2. लिखी गई विषय-वस्तु पठनीय होनी चाहिए।

3. अक्षरों का झुकाव दाहिनी ओर या बायीं ओर नही होना चाहिए।

4. अक्षर बिल्कुल सीधे लिखे होने चाहिए।

5. लिखी गई पंक्तियाँ बिल्कुल सीधी होनी चाहिए।

6. समान रूप वाले अक्षर जैसे- म और य, में और भ, घ और ध ये अक्षर

बिल्कुल साफ-साफ और समझने योग्य होने चाहिए।

7. लिखित दो पंक्तियों के मध्य अन्तर होना चाहिए।

8. दो शब्द के बीच में भी अन्तर होना चाहिए।

9. अनुच्छेदों के बीच भी अन्तर होना चाहिए।

बैठने का ढंग

बैठने के ढंग से लिखने में बड़ा प्रभाव पड़ता है। लिखते समय बालक को सीधे बैठना चाहिए न कि झुक कर यानि रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी होनी चाहिए। चाहे तो बालक अपने सामने तख्ती, मेज, कॉपी या चौकी पर रखकर लिखे।

आँखों से कागज की दूरी ।

कक्षा के अन्दर अध्यापक को ये विशेष ध्यान देना चाहिए अगर कोई बालक लिख रहा है तो उसकी आँखों से कागज की दूरी कितनी है। आँखों और कागज के बीच कम-से-कम एक फुट की दूरी होना आवश्यक है। इससे कम दूरी आँखों की रोशनी के लिए हानिकारक होती है।

कलम पकड़ने की विधि

अध्यापक कक्षा के अन्दर बालकों को कलम पकड़ने का ढंग इस प्रकार से बताएं की कलम अँगूठे और उँगली के बीच आ जाये। कलम का मुँह कन्धे से बाहर की ओर निकला हुआ होना चाहिए। लिखते समय हथेली का भाग स्पष्ट रूप से दिखते रहना चाहिए। कलम 45 अंश पर कटी होनी चाहिए। ऐसा करने से लिखने में सुन्दरता आती है।

शिरोरेखा

अक्सर यह देखा जाता है कि बालक कोई भी अक्षर लिखते हैं तो वे उनका राज गति समय गलतियाँ कर देते हैं। और वे इन रेखाओं को तिरछी सीधी व बड़ी बनाने में विशेष आनन्द की प्राप्त करते हैं। इसलिए अध्यापक को सबसे पहले बच्चों से इस प्रकार में खिचवाना चाहिए। जब रेखा खींचने में उनके हाथ सधने लगे तो उसके बाद अक्षरों के आकार बनवाने चाहिए। अक्षर लिखने के बाद उस पर सीधी शिरोरेखा खीच सकते हैं।

अशुद्धियाँ और उनका समाधान

लखन की शिक्षा पढने के बाद दी जानी चाहिए क्योंकि लिखने की शिक्षा बालक जाय जब उसकी माँसपेशियाँ मजबूत हो जायें। सर्वप्रथम शिक्षक को बालक चित्रकारी करने की स्वतन्त्रता देनी चाहिए, चित्रकारी के द्वारा ही बालक लिखना सीखते हैं। चित्रकारी लिखने की पहली सीढ़ी है।

लेखन शिक्षण के लिए शिक्षक को कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए तभी वह बालक को अच्छी प्रकार से लिखना सिखा सकता है।

लेखन शिक्षण के लिए आवश्यक बातें

ये बातें निम्नलिखित हैं

1. बालक को लिखना तभी सिखायें जब वह लिखने में रुचि ले।

2. अक्षरों को सरल से कठिन के क्रम में लिखना सिखाया जाये जैसे-प, व, र, भ आदि अक्षर पहले क्ष, त्र, ज्ञ आदि कठिन अक्षर बाद में। वाक्य भी सरल से कठिन की ओर सूत्र के आधार पर लिखने सिखाये जायें।

3. अध्यापक को चाहिए कि वह बालक के लिखने की गति पर प्रारम्भ में ध्यान न देकर अक्षरों, शब्दों और वाक्यों की शुद्धता पर ध्यान दे।

4. प्रारम्भ में अक्षरों का आकार बड़ा होना चाहिए धीरे-धीरे अक्षरों के आकार छोटे किये जायें।

5. बालक के मन में लिखने के प्रति उदासीनता नहीं होनी चाहिए।

6. लिखना सिखाते समय बालक की व्यक्तिगत् विभिन्नता पर ध्यान देना चाहिए। सभी बालक एक सा नहीं लिख सकते।

7. लेखन कार्य पढ़े हुए अंश से सिखाना चाहिए। बालक पढ़ी हुई बात को आसानी से लिख लेते हैं।

भाषा शिक्षण में लिखना सिखाना महत्त्वपूर्ण अंग है। लेखन का शुद्ध होना भी आवश्यक है, अशुद्ध लेखन का प्रभाव पाठक पर अच्छा नहीं होता। शुद्ध लेखन के लिए निम्न बातों पर विचार करते हैं।

  • अशुद्धियों के प्रकार
  • अशुद्धियों के कारण

(ii) अशुद्धियों का निराकरण या समाधान।

अशुद्धियों के प्रकार

लिखने में बालक कई प्रकार की अशुद्धियाँ करते हैं। वे अशुद्धियाँ निम्नलिखित हैं

पूर्ण वर्ण सम्बन्धी अशुद्धियाँ – प्रायः देखा जाता है कि बहुत से विद्यार्थी वर्ण के उच्चारण भेद को नहीं समझते और एक वर्ण के स्थान पर उससे मिलता जुलता दूसरा वर्ण लिख देते हैं, उससे शब्द का पूरा अर्थ ही बदल जाता है। बालक निम्न लेखन अशुद्धियाँ करते हैं।

  • ‘ब’ और ‘व’ अशुद्धियाँ-जैसे,

वन की जगह बन, वीर की जगह बीर,

 बाहर की जगह वाहर लिखना अशुद्ध है।

(ख) ‘छ’ और ‘क्ष’ की अशुद्धियाँ-जैसे-‘छात्र’ और ‘ आत्र’, ’11’ और ”’, ‘क्षत्रिय’ और ‘छत्रिय’ आदि।

(ग) ‘घ’ और ‘ख’ की अशुद्धियाँ जैसे-‘बरषा’ के स्थान पर सखा’, ‘ * स्थान पर ‘पुरुख’ लिखना।

2. अर्द्ध वर्ण सम्बन्धी अशुद्धियाँ – हिन्दी भाषा शिक्षण में जितना पूर्ण वर्ग का हर है उतना ही आधे वर्ण का भी महत्व है। बालक आधे अक्षरों की जगह पर छ । छ , अशुद्ध शब्द लिखते हैं। इस प्रकार अर्द्ध वर्ण की निम्नलिखित अशुद्धियाँ करते हैं

(क) आधे ‘र’ की अशुद्धियाँ-प्रायः देखा जाता है कि विद्यार्थी अध्र ‘र’ के बहुत अशुद्धियाँ करते हैं जैसे-‘प्राप्त’ के स्थान पर ‘प्रापत’, ‘प्रमाण’ के स्थान पर ‘पर’, प्रश्न । प्रश्न लिखना। ‘निर्मल’ को ‘निरमल’, ‘कर्म’ को ‘करम’ या ‘क’ को ‘क्रम’ लिने की अशुद्धियाँ करते हैं।

(ख) ‘क्ष’ और छ की अशुद्वियाँ–’दीक्षा’ को ‘दीक्छा’, ‘नक्षत्र’ की ‘नछत्र’, ‘f% | को ‘भिक्छा’ लिखना।

(ग) हलन्त की अशुद्धियाँ-जो आधे वर्ण शब्द के अन्त में आते हैं उन्हें लिखने के लिए उस अक्षर में हलन्त लगाना होता है, जिसका निशान () यह हैं परन्तु बालक हलन्त नहीं लगाते और पूर्ण अक्षर लिख देते हैं जैसे-‘अर्थात्’ को ‘अर्थात’, ‘पश्चात्’ को ‘पश्चात’ राजन् को ‘राजन’ लिखना।

(3) मात्रा और वर्ण सम्बन्धी अशुद्धियाँ – वर्ण के साथ-साथ कुछ मात्रा की श्री अशुद्धियाँ लिखने में बालक करते हैं। जैसे-‘बीमार’ को बिमार, परीक्षा को परिक्षा लिन्छन। ऐसी अशुद्धियाँ निम्न हैं

(क) ‘आ’ तथा ‘वा’ की अशुद्धियाँ-बालक ‘हुआ’ के स्थान पर ‘हुवा’ लिखते हैं।

(ख) ‘ई’ तथा ‘यी’ की अशुद्धियाँ – ‘ई’ और ‘यी’ की अशुद्धियाँ प्राय: बहुत लोग करते हैं, जैसे, स्थायी’ को ‘स्थाई’, ‘गई’ को ‘गयी’, ‘हुई’ को ‘हुयी’ लिखना।

(ग) ‘ए’ और ‘ये’ की अशुद्धियाँ – जैसे, ‘गए’ के स्थान पर गये’, ‘जाए’ को ‘जाये’, पढ़ाए’ को पढ़ाये’ लिखने की अशुद्धियाँ।

(घ) ‘ए’ तथा ‘ऐ’ की अशुद्धियाँ – जैसे, ‘ऐसा’ के स्थान पर एसा’, ‘खएगा’ के स्थान पर ‘खाएगा’, ‘हुए’ के स्थान पर ‘हुऐ’ लिखना।

(4) अनुस्वार सम्बन्धी अशुद्धियाँ – विद्यार्थियों को यह समझ नहीं आता कि अनुस्वार का प्रयोग कहाँ करना चाहिए और अर्द्ध अक्षर का कहाँ ? इसलिए वे इस प्रकार की अशुद्धियाँ करते हैं जैसे-‘दिनाक’ और ‘दिनांक’, ‘चदां’ और ‘चन्दा’ सम्भव और संभव।।

(क) अनुस्वार एवं संयुक्त अक्षर की अशुद्धियाँ – जैसे, डण्डा’ और ‘दण्डा’, पत्रम और पंचम।

(ख) अनुस्वार और चन्द्र बिन्दु की अशुद्धियाँ प्रायः बालक इन दोनों में भेद नहीं करते और अनुस्वार का ही अधिक प्रयोग करते हैं। जैसे, ‘चाँद’ को ‘चांद’, ‘आँख’ को ‘आंख’, हँस’ को ‘हंस’ लिखने का अशुद्धियाँ करते हैं।

 (5) लिंग भेद की अशुद्धियाँ – जिन लोगों को हिन्दी भाषा का ज्ञान नहीं होता वे प्रायः लिग भेद की अशुद्धियाँ करते हैं। जैसे-लड़की आ गया। वह विद्वान् महिला है। इसमें विदुषी के स्थान पर विद्वान लिखना अशुद्ध है।

(6) वचन की अशुद्धियाँ – छात्र-छात्राओं को एक वचन से बहुवचन बनाने के नियम का ज्ञान नहीं है। इसलिए वे वचन की अशुद्धियाँ करते हैं-जैसे, ‘चिड़ियाँ को ‘चिडिया ‘लड़कियाँ’ पढ़ रही है। ध्वजाएँ के स्थान पर ध्वजायें लिखने की अशुद्धियाँ करते हैं। |

(7) विभक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ – जब विद्यार्थियों को व्याकरण का ज्ञान नहीं होता । वे विभक्ति सम्बन्धी अशुद्धियाँ करते हैं। जैसे, ‘पेड़ में पत्ते गिर रहे हैं’, ‘से’ की जगह में का अशुद्ध प्रयोग, ‘मोहन का एक बेटा है’, ‘के’ के स्थान पर ‘का’, का अशुद्ध प्रयोग।

उपर्युक्त अशुद्धियों को जानने के बाद उन अशुद्धियों के कारण क्या हैं, जनना आवश्यक

लेखन में अशुद्धियों के कारण

लेखन सम्बन्धी अशुद्धियों के निम्नलिखित कारण होते हैं।

(1) अशुद्ध उच्चारण – छात्र-छात्राएँ लिखने में शुद्ध नहीं होता। हिन्दी भाषा में वर्ण का जैसा उच्चारण किया जाता है वैसा ही लिखा जाता हैं इस में हर वर्ण की ध्वनि अलग है। अत: यदि विद्यार्थी अशुद्ध उच्चारण करेगा तो अशुद्ध लिखेगा जैसे शकल को सकल लिखना, सुन्दर को शुन्दर लिखना। यदि अध्यापक का उच्चारण अशुद्ध होता है तो विद्यार्थी भी अशुद्ध उच्चारण करना सीख जाते हैं, इसी कारण उनके लेखन में अशुद्धियाँ होती हैं।

(2) मात्राओं का उचित ज्ञान न होना-छात्र – छात्राएँ लघु एवं दीर्घ मात्राओं से अच्छी तरह परिचित नहीं होते इसलिए वे मात्राओं की अशुद्धियाँ करते हैं। जैसे, कीजिये’ और ‘कीजिए’, पढ़िए’ और ‘पढ़िये’, ‘गई और इसका ‘गयी’ में कौन-सा शुद्ध है। बालकों को इसका पूर्ण ज्ञान नहीं होता। इसलिए बालक अशुद्ध मात्राएँ लिखते हैं। उदाहरण के लिए-बाहर को बहार, चाहता को चहाता, परीक्षा को परिक्षा लिखना।

(3) क्षेत्रीय प्रभाव – अहिन्दी भाषा-भाषी प्रान्तीय भाषा एवं क्षेत्रीय प्रभाव के कारण अशुद्ध लिखते हैं। अहिन्दी भाषा-भाषी अशुद्ध बोलते हैं और अशुद्ध लिखते हैं। उदाहरणार्थ-बंगाली ‘स’ को ‘श’ बोलते हैं। इसलिए ‘साँप’ को ‘शाँप’, ‘सड़क’ को ‘शड़क’, बोलते और लिखते हैं। पंजाब प्रान्त में पंजाब के भाषा भाषी ‘ण’ को ‘न’ बोलते हैं जैसे-‘प्रमाण’ को ‘प्रमान’, ‘कारण’ को ‘कारन’ बोलना और लिखना, कशमीरी ‘भूखे’ को * भूक’, ‘धोबी’ को ‘धोभी’, ‘झाडू’ को ‘जाडू’ बोलना और लिखना।।

(4) असावधानी – कई बार छात्र छात्राएँ शीघ्रता के कारण असावधानी में अशुद्ध लिखते हैं, कभी-कभी वर्ण छूट जाता है कभी-कभी मात्राएँ गलत लगा देते हैं। जैसे-‘अध्ययन’ को ‘अध्यन’, ‘नमक’ को ‘मनक’, ‘कमल’ को ‘कलम’ लिखना अशुद्ध है।

(5) लिपि का अधूरा ज्ञान – छात्र-छात्राओं को हिन्दी वर्णमाला का पूर्ण ज्ञान नहीं होता इसलिए वे अशुद्ध लिखते हैं। बालकों को ‘रफ’ का अशुद्ध ज्ञान होता है इसलिए वे ‘निर्मल

मिल’ ‘कर्म’ को ‘र्कम’ लिखते हैं। अनुस्वार, अनुनासिक, चन्द्र बिन्द के पूर्ण ज्ञान । होने के कारण अशुद्ध लिखना, जैसे-‘कंचन’ को ‘कक्रचन’, ‘ऊँचा’ को ‘ऊंचा’, ‘कंठ’ को ‘कन्ट’, ‘संसार’ को ‘सन्सार’ लिखना।। |

(6) उर्दू व अन्य भाषाओं का प्रयोग – उर्दू व अन्य भाषाओं के प्रभाव से विद्यार्थी अशुद्ध लिखते हैं, जैसे-उर्दू के प्रभाव से प्रताप’ को ‘परताप’ अँग्रेजी के प्रभाव से ‘गुप्त’ को ‘गुप्ता लिखना।

अशुद्धियों के निराकरण या समाधान

उपर्युक्त अशद्धियों के कारण जानने के बाद शिक्षक का यह कर्तव्य होता है कि वह इन अशद्धियों का निराकरण करे। अशुद्धियों का निराकरण करने के लिए निम्नलिखित बातों का अपनाना चाहिए।

(1) शुद्ध उच्चारण की शिक्षा – हिन्दी भाषा बहुत वैज्ञानिक है। हिन्दी वर्णमाला के सभी वर्णों के उच्चारण का बच्चों को शुद्ध ज्ञान देना चाहिए। अध्यापकों का उच्चारण भी शुद्ध होना

हिए। जब बच्चे सभी वर्गों का सही उच्चारण करेंगे तो वे शुद्ध लिखेंगे। |

(2) मात्राओं, अनुस्वार, अनुनासिक, चन्द्र बिन्दु का स्पष्ट ज्ञान – विद्यार्थियों को मात्राओं का सही ज्ञान देना चाहिए उन्हें स्पष्ट होना चाहिए कि इ ( 1 ) की मात्रा व्यंजन से पहले, ई (1) की मात्रा व्यंजन के बाद, उ, ऊ, (,), () की मात्रा व्यंजन के नीचे लगती है। रफ ( ) की मात्रा उच्चारण स्थान के बाद वाले अक्षर पर लगती है। विद्यार्थियों को अनुस्वार अनुनासिक, चन्द्र बिन्दु का स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए तभी वे शुद्ध लिख सकेंगे।

(3) पढ़ने के अवसर – छात्रा छात्राओं को अधिक से अधिक पढ़ने के अवसर दिये जाए। बच्चे जितना अधिक ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे उनके लेखन में शुद्धता आएगी।

(4) व्याकरण का ज्ञान – यदि व्याकरण का ज्ञान विद्यार्थियों को अच्छी तरह सिखाया जाए तो विद्यार्थी लिखने में अशुद्धि नहीं करेंगे।

(5) लिखित कार्य का संशोधन – विद्यार्थियों को कक्षा में जो भी लिखित कार्य अध्यापक कराये या विद्यार्थी जो गृह-कार्य लिख कर लाए अध्यापक को उनका संशोधन अच्छी तरह करना चाहिए और फिर संशोधित शब्दों का विद्यार्थियों से शुद्ध लिखने का अभ्यास भी करवाना चाहिए।

(6) अनुलेख, श्रुतलेख एवं प्रतिलेख – शिक्षक को विद्यार्थियों से अनुलेख, श्रुतलेख और प्रतिलेख लिखवाने चाहिए, इससे उन्हें शुद्ध लिखने की आदत पड़ेगी।

(7) शब्दकोश का प्रयोग-विद्यार्थियों को शब्दकोश का प्रयोग करना सिखाना चाहिए। | जब किसी शब्द का शुद्ध रुप बच्चे जानना चाहें तो वे शब्द कोश से शुद्ध शब्द का ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे।

(8) शब्द-तालिकाएँ – बच्चों से शब्द तालिकाएँ बनवानी चाहिए, बच्चे नए-नए पढ़े हुए शब्द उनमें लिखें, तथा वे शब्द भी लिखें जिन्हें वह अशुद्ध लिखते हैं। इससे वे शुद्ध शब्द लिखना सीख जाएगे।

(9) कुशल अध्यापक –  यदि अध्यापक को हिन्दी भाषा का पूर्ण ज्ञान होगा तो वह बालकों को व्याकरण का सही ज्ञान दे सकेगा। जिससे बालक शुद्ध लिखना सीखेंगे। अध्यापक को कुशलतापूर्वक बच्चों की लेखन की अशुद्धियाँ दूर करनी चाहिए।

लिपि

जब हम अपने भावों अथवा विचारों की विभिन्न दशाओं को शिलाखण्ड, पत्थर, काष्ठ, मिट्टी, कागज आदि पर वर्णो, चित्रों अथवा चिह्न द्वारा अंकित करते हैं, तो वह लिपि कहलाती है।

अक्षर की सुडौलता

कक्षा में अध्यापकों को बच्चों को लिखने की शिक्षा देते समय विशेष ध्यान देना चाहिए। अध्यापकों को बच्चों द्वारा लिखे जाने वाले अक्षरों की सुडौलता एवं सुन्दरता पर विशेष ध्यान देना अति आवश्यक होता है। कक्षा में जब बच्चे लिख रहे हों तो उस समय शिक्षक को भ्रमण करते हुए उनकी लिखावट को ध्यानपूर्वक देखना चाहिए। अक्षर ने अधिक बड़े हो और न अधिक छोटे हों। कागज के ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ चारों और कुछ स्थान छोड़कर लिखना चाहिए। अक्षर तिरछे न लिखकर सीधे व खड़े रूप में लिखे होने चाहिए। दो पंक्तियों के बीच में एक पंक्ति के बराबर अन्तर होना आवश्यक है।

सुलेख

सुलेख शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – स+लेख। ‘स’ का अर्थ है- सुन्दर या अच्छा लख का अर्थ है- लेख या लिखना। ऐसी लिखावट जो अच्छे ढंग से लिखी गई हो और वह अच्छी तरह से पढ़ी जा सके व समझी जा सके।

सुलेख के उदेश्य

1. बालक के हाथ, मस्तिष्क व हृदय में समन्वय हो।

2. बालकों में सौन्दर्यानुभूति की भावना आए।

3. बालक आकर्षक, सुडौल अक्षर लिखने को प्रवृत्त हो।

4. छात्र सुन्दर और सुपाठ्य लिखते समय समुचित गति का निर्वाह कर सके।

5. छात्रों को इन्द्रिय शिक्षण मिले।

6. विद्यार्थी व्यावहारिक जीवन के लिए तैयार हो।

सुलेख में रूचि उत्पन्न करने के उपाय

अच्छे कार्य करने पर छात्रों की सराहना करनी चाहिए। उन्हें प्रोत्साहन करना चाहिए। बच्चों को अच्छी-अच्छी कविताएँ, कहानियाँ, चुटकले, पहेलियाँ आदि का संकलन करने हेतु प्रेरित करना चाहिए। सुन्दर लेख, श्रुतिलेख, अनुलेख, निबन्ध लेखन आदि प्रतियोगिताओं का आयोजन करना चाहिए। आवश्यकतानुसार बच्चों को पुरस्कार भी देने चाहिए। विद्यालय पत्रिका का प्रकाशन किया जाना चाहिए। अधूरी किसी कहानी को पूरा करना चाहिए। किसी भी घटना का वर्णन करना चाहिए।

विशेषताएँ ।

1. लिखी गई विषय-वस्तु पठनीय होनी चाहिए।

2. अक्षरों का झुकाव दाहिनी ओर या बायीं ओर नही होता, बिल्कुल सीधे लिखे | जाने चाहिए।

3. अक्षर सुडौल होते हैं।

4. पंक्तियाँ टेढ़ी न होकर सीधी हों।

5. दो शब्दों के बीच, दो पंक्तियों के बीच व अनुच्छेदों के बीच अन्तर होना | चाहिए।

6. जो कुछ लिखा जाता है, वह सुन्दर एवं आकर्षक होता है। सुलेख कार्य का संशोधन करते समय निम्न बातों का ध्यान अति आवश्यक है

1. संशोधन के लिए अध्यापक की कलम बच्चों की कलम के अनुपात की हो।

2. बच्चों के सुलेख कार्य का संशोधन उन्हीं के सामने करना चाहिए।

3. सुलेख में अशुद्ध अक्षर पर लाल स्याही की कलम से संशोधन करना चाहिए।

श्रुतलेख

श्रुतलेख को अंग्रेजी में ‘डिक्टेशन’ कहते है। अगर अध्यापक बच्चों को कक्षा 5 से सुलेख या श्रुतलेख की शिक्षा देना शुरू कर दें तो अच्छा होगा। श्रुतलेख को सुनकर लिखते है। श्रुतलेख में अध्यापक बालते जाते है और बच्चे लिखते जाते हैं। श्रुतलेख से लिखने में तीव्रता से विकास होता है। | शाब्दिक रुप से श्रुतलेख शब्द लैटिन क्रिया ‘डिकटो’ से आता है डिक्टेशन एक लिखित कार्य का एक रूप है, जिसमें छात्रों को शिक्षक की श्रुतलेख के लिए अलग-अलग पाठ लिखते हैं। श्रुतलेख की आवश्यकता

देशी या विदेशी भाषा का अध्ययन करते समय छात्र-कौशल के प्रशिक्षण के रूप में। व्याख्यान आयोजित किया जाता है। यहाँ विशेष रुप से वर्तनी और विराम चिह्नों में प्रशिक्षण का आवश्यकता होती है।

श्रुतलेख के प्रकार

इसके दो मुख्य प्रकार हैं। प्रशिक्षण और नियंत्रण। हालांकि, विभाजन सशर्त है, क्योंकि दोनों उकार के शिक्षण और निगरानी उद्देश्यों का पीछा करते हैं। दूसरे शब्दों में, छात्रों को न केवल शिक्षण उपाधि के दौरान प्रशिक्षित किया जाता है, अपितु केवल श्रुतलेख की सहायता से ज्ञान की जांच की जाती है।

एक श्रुतलेख लिखने के लिए, आमतौर पर उपन्यास से ग्रंथों के टुकड़े का चयन करें। कालांकि, शिक्षक प्रायः शब्दावली निर्देशों का संचालन करते हैं, और इस मामले में शब्दों या वाक्यांशों को निर्धारित किया जाता है।

श्रुतलेख के लाभ

1. इससे छात्रों की सुनने की व समझने की क्षमता में वृद्धि होती है।

2. इससे छात्रों के लेखन की गति तीव्र हो सकती है।

3. सावधानीपूर्वक श्रुतलेखन किया जाये तो सुलेखन में सहायता प्राप्त होती है।

4. इससे छात्रों में बौद्ध शक्ति का विकास होता है।

श्रुतलेख से हानि

1. यदि श्रुतलेखन सावधानी से न किया जाए तो इससे सुलेखन निम्नस्तरीय हो सकता है।

2. तीव्र गति से लिखने के कारण शब्द या वर्ण छूटने का खतरा बना रहता है।

3. यहाँ अशुद्धियों की सम्भावना अधिक रहती है।

4. वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ बढ़ जाती हैं।

क्रियाकलाप

1. परिचित वस्तुएं :

बच्चों से रसोई के सामानों की सूची बनवाना और ऐसी दूसरी चीजें जो उनके परिवेश से मिलती-जुलती है, जैसे कपड़ों, जानवरों इत्यादि की भी सूची बनवाना। इन्हें सूचीबद्ध कर ब्लैकबोर्ड पर लिखें। इसके बाद बच्चों के दो समूह बनवाएँ एवं उन सामानों की सूची के अनुसार बच्चों के नाम लिखें, जैसे सीमा-कप, प्रीति-गिलास। अब दूसरे समूह के बच्चे उस सामान की मांग करेंगे और वह बच्चा खड़ा होकर उस बच्चे को बताएगा कि उस वस्तु का नाम कैसे लिखते हैं?

2. निशान इकट्ठा करना :

यह निर्भर करता है कि स्कूल कौन से क्षेत्र में है। बच्चों से पूछ सकते हैं कि उन्होंने स्कूल आते समय कौन-कौन-से निशान देखे थे जैसे पोस्टर, विज्ञापन आदि। इसके पश्चात् बच्चों को सारे निशान स्लेटबोर्ड पर लिखना है और उसके बारे में बताना है कि उसे उन्होंने कहाँ देखा और उसका उपयोग कहाँ पर होता है।

3. शब्द पूरा करना :

बच्चों का समूह बनवाकर शब्द देना और उससे वाक्य बनवाना।

4. पहेली :

| बच्चों का एक समूह बनवाएँ, उन्हें एक पेपर दें और उस समूह में से एक बच्चा एक वाक्य सोचकर एक शब्द लिखेगा और अपने पास वाले बच्चे को दे देगा। यह पेपर एक बच्चे से दूसरे बच्चों में हस्तांतरित होता जाएगा और अन्तिम वाले बच्चे को बताना है कि पहले वाले बच्चे ने क्या वाक्य सोचा होगा। इसी प्रकार से इस गतिविधि को आप दुबारा कर सकते हैं और एक नए शब्द से भी शुरू कर सकते हैं।

अध्याय सार

  • भाषा के दो रूप होते है- मौखिम और लिखित।।

सीखने में ध्यान रखने योग्य बातें

1. बैठने का ढग

2. आंखों से कागज की दूरी।

3. कलम पकड़ने की विधि

4. शिरोरेखा

  • ऐसी लिखावट जो अच्छे ढंग से लिखी गई हो और वह अच्छी तरह से पढ़ी जा सके । समझी जा सके उसे सुलेख कहा जाता है।

ऋतुलेख को अंग्रेजी में ‘डिक्टेशन’ कहते है। इससे लेखन में तीव्रता से विकास होता है।

प्रश्नावली

1. लेखन शिक्षण क्या है ?

2. लिखित अभिव्यक्ति का महत्व बताओ।

3. बैठने के ढंग को परिभाषित करो।

4. आँखों से कागज की दूरी के बारे में बताओ। |

5. कलम पकड़ने की विधि का वर्णन करो।

6. शिरोरेखा क्या है ?

7. अक्षर की सुडौलता के विषय में बताओ।

8. सुलेख के उद्देश्यों का वर्णन करो। |

9. सुलेख की विशेषताएँ बताओ। |

10. श्रुतलेख क्या है ?

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