DElEd 1st Semester Hindi Short Question Answer in Hindi

प्रश्न 38. वाचन के प्रकार बताइए।

उत्तर – वाचन के प्रकार (1) सस्वर वाचन–स्वर सहित वाचन को सस्वर वाचन कहते हैं अर्थात् लिखी हुई विषय वस्तु को देखकर सस्वर पढ़ना सस्वर वाचन है। सस्वर वाचन के दो भेद हैं

(i) आदर्श वाचन, (ii) अनुकरण वाचन।।

(2) मौन वाचन–लिखित सामग्री को मन ही मन चपचाप बिना आवाज निकाले | पढ़ना मौन वाचन कहते हैं। मौन वाचन में ओष्ठ नहीं हिलते । जड महोदय का कथन है कि बालक जब पैरों से चलना सीख जाता है तो घुटनों के बल खिसकना छोड़ देता है। इसी प्रकार भाषा के क्षेत्र में बालक जब मौन वाचन की कुशलता प्राप्त कर लेता है तो सस्वर वाचन का अधिक प्रयोग छोड़ देता है। मौन वाचन में निपुणता का आना व्यक्ति के विचारों की प्रौढता का द्योतक है और भाषायी दक्षता पर अधिकार का सूचक है

प्रश्न 39. सस्वर वाचन की विशेषताएँ लिखिए। (बी.टी.सी. 2016)

अथवा

सस्वर वाचन के दो गुण लिखिए।       (बी.टी.सी. 2015)
उत्तर-               उत्तम ( सस्वर) वाचन के गुण

(i) ध्वनियों का ज्ञान—बालक को विभिन्न ध्वनियों का ज्ञान होना चाहिए तथा समान ध्वनियों में भेद करने की सामर्थ्य होनी चाहिए।

(ii) उच्चारण की शुद्धता–उत्तम सस्वर वाचन में शुद्धता का विशेष महत्व है। अतः प्रत्येक शब्द का उच्चारण शुद्ध रूप में करना चाहिए। उच्चारण में अशुद्धता कई कारणों से आ जाती है; उदाहरण–क्षेत्रीय प्रभाव के कारण, मनोवैज्ञानिक कारण, अज्ञानतावश गलत अभ्यास, अध्यापक का अशुद्ध उच्चारण, उच्चारण स्थलों में दोष आदि। अत: परीक्षण के माध्यम से कारण का पता लगाकर उसे दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।

(iii) विराम चिह्न–अल्प विराम, अर्द्ध विराम तथा पूर्ण विराम का ध्यान रखकर पढ़ना चाहिए। ‘रोको मत जाने दो’ वाक्य में यदि रोको के पश्चात् विराम करके पढ़े तो एक अर्थ होगा और मत के बाद विराम करके पढ़ें तो दूसरा अर्थ होगा। अतः विराम चिह्न अर्थ बदल देता है।

(iv) स्पष्टता—वाचन स्पष्ट होना चाहिए। इसके लिए स्वर पर नियन्त्रण आवश्यक है। इतनी जोर से पढ़ना चाहिए कि समस्त श्रोता सुन लें। शब्दों के समूहों को एक श्वास में पढ़ते समय उनमें अर्थ की संगति का ध्यान रखा जाये । प्रत्येक वर्ण का उच्चारण पृथक् रूप में ही किया जाये।

(v) उपयुक्त बलाघात–बल शक्ति की वह मात्रा है जिसके द्वारा कोई वर्ण अथवा | शब्द उच्चारित किया जाता है। वाचन में इस बात को दृष्टिगत रखना चाहिए कि किस शब्द

पर कितना बल देना है क्योंकि बल की मात्रा के अनुसार शब्द के अर्थ में परिवर्तन आ जात है। यथा—हे प्रभो ! मुझे एक शीलवान पुत्र दीजिए। इस वाक्य में यदि पुत्र पर बल देते हैं ते इसका अर्थ होगा पुत्र ही चाहिए पुत्री नहीं। यदि शीलवान पर बल देकर पढ़ेंगे तो उसक तात्पर्य होगा शीलवान ही चाहिए शीलरहित कदापि नहीं। यदि उपयुक्त वाक्यों में इन शब्द पर बल नहीं दिया जायेगा तो उसका तात्पर्य होगा पुत्री भी चलेगी, शीलवानहित भी चलेगा अत: साधारण रूप में कहने एवं बलाघात करते हुए कहने से अर्थ में परिवर्तन आ जाता है इसलिए यथास्थान उपयुक्त बलाघात करना चाहिए।

(vi) प्रवाह- वाचन में प्रवाह को दष्टिगत रखा जाये। गति पर नियन्त्रण आवश्यक है न तो बहुत द्रुत गति से पढ़ना चाहिए और न रुक-रुक कर धीर-धार

(vii) अर्थ की प्रतीति सुन्दर वाचन वह वाचन है जो पढ़ते समय शब्द का अर्थ ९ करता चलता है। यदि गति, लय, उच्चारण, विराम आदि का ध्यान रखकर वाचन किया जा रहा है तो अर्थ की प्रतीति स्वाभाविक रूप से होती चलेगी।

(viii) स्वर में रसात्मकता_अच्छा वाचक कर्कश ढंग से नहीं पढ़ता है; न ही उसमें रूखापन रहता है, वरना आसान ढंग से मधरता के साथ शब्दों का उच्चारण करता है। करुण रस की प्रधानता होने पर ओज नहीं दिखाना चाहिए।

(Ix) वाचन की मुद्रा वाचन करते समय अच्छा वाचक अनावश्यक डग से हाथ नहीं पटकेता, मेज नहीं पीटता, अंगुलियों को नहीं नचाता, पैर से तबला नहीं बजाता, पुस्तक को विकृत ढंग से नहीं पकड़ता, न झुककर पकड़ता एवं न अकड़कर पकड़ता है।

(x) रुचि–अच्छा वाचक पढ़ने में रुचि रखता है। उसे वाचन में आनन्द आता है। उसकी रुचि देखकर श्रोता भी आनन्द लेते हैं। वाचन में उसे न तो ऊब आती है और न ही इसे वह व्यर्थ का काम समझकर करता है।

प्रश्न 40. देवनागरी लिपि की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।     (बी.टी.सी. 2015 II)

उत्तर–देवनागरी लिपि की विशेषताएँ हिन्दी की लिपि देवनागरी’ है। इसका विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। वर्तमान रूप ब्राह्मी का विकसित रूप है। समय-समय पर देवनागरी लिपि में नवीन ध्वनियाँ और उनके लिए नये-नये चिह्न बना लिये गये। यही कारण है कि आज हमारी वर्णमाला तथा लिपि विश्व की सबसे विकसित वर्णमाला और लिपि मानी जाती है। स्पष्टता तथा व्यंजकता में अन्य दूसरी कोई लिपि इसकी तुलना नहीं कर सकती। संस्कृत, हिन्दी, मराठा तथा नेपाली भाषाएँ इसी लिपि में लिखी जाती हैं। बंगला एवं गुजराती लिपियाँ इससे काफी मिलती-जुलती हैं। गुरुमुखी, मुंडा, कैथी आदि लिपियाँ भी देवनागरी लिपि से ही विकसित हुई हैं।

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