DElEd 1st Semester Hindi Short Question Answer in Hindi

DElEd 1st Semester Hindi Short Question Answer in Hindi

प्रश्न 45. समोच्चारित भिन्नार्थक शब्द तथा समानार्थी शब्द में अन्तर स्पष्ट कीजिए।    (बी.टी.सी. 2015 II)

उत्तर–समोच्चारित ( समरूपी ) भिन्नार्थक शब्द–समोच्चारित वे शब्द हैं जो उच्चारण की दृष्टि से इतने मिलते-जुलते हैं कि प्रयोगकर्ता उन्हें एक ही मान लेते हैं जबकि उनका र्थ एक-दूसरे से अलग होता है।

जैसे—अंश—भाग, अंस—कंधा, अति—बहुत, इति–समाप्त।

समानार्थी शब्द एक अर्थ को व्यक्त करने वाले अनेक शब्दों को पर्यायवाची अथवा समानार्थी कहते हैं। जैसे—जल को नीर, वारि, पानी कहते हैं।

अग्नि को अनल, पावक, आग, ज्वाला भी कहते हैं।

प्रश्न 46. अल्प विराम का प्रयोग कब करते हैं ? | ( बी.टी.सी. 2015 II)

उत्तर–पूर्ण विराम–‘पूर्ण विराम’ का अभिप्राय है, पूर्णरूपेण रुकना या ठहरना। सामान्यत: जहाँ वाक्य की गति अन्तिम लेकर विराम ले, वहाँ पूर्ण विराम का प्रयोग होता है;

जैसे

(अ) सोहन खेलता है।

(ब) राम और श्याम विद्यालय गये थे।

अल्प विराम–‘ अल्प विराम’ का प्रयोग पढ़ते या बोलते समय कुछ देर रुकने हेतु किया जाता है; उदाहरणार्थ

(अ) कविता, गीता और माया अपनी कक्षा में प्रथम आये।

(ब) मेरे पिताजी, जो कि एक सरकारी अधिकारी हैं, उनका स्थानान्तरण आगरा हो गया है।

प्रश्न 47. मौखिक अभिव्यक्ति के साधन लिखिए। ( डी.एल.एड. 2018)

उत्तर  मौखिक अभिव्यक्ति के साधन

(1) चित्र पाठन– बच्चों को चित्र का ज्ञान कर उनसे उसमें सम्बन्धित प्रश्न पूछने चाहिए। चित्र ऐसे होने चाहिए जिनका कुछ अर्थ निकल रहा है। नैतिक कहानियों के चार्ट आते हैं, बच्चों को उन चार्टी में प्रकाशित कहानियों की अभिव्यक्ति हेतु कहा जाना चाहिए।

(2) कहानी पाठ – बच्चों को गृहकार्य के रूप में कहानी बनाकर लाने हेतु कहा जाना चाहिए। इस प्रकार की मौखिक अभिव्यक्ति से बच्चे की  भाषा, कल्पना- शक्ति, रूचि, कथन- शैली तथा मस्तिष्क का विकास होता है।

(3) कविता – पाठ – कविता द्वारा बच्चों के उच्चारण, अक्षर अभिव्यक्ति एवं रूचि का ज्ञान होता है।

(4) अभिनय एवं अनुसरण – बच्चों को अभिनय हेतु प्रेरित किया जाना चाहिए। इससे बच्चों के उच्चारण में सुधार होता है, उनकी शारीरिक अभिव्यक्ति में भी सुधार होता है।

(5) वाद – विवाद – वाद- विवाद से मौखिक अभिव्यक्ति का विकास होता है। बच्चों की झिझक तथा संकोच समाप्त हो जाता है। इससे वाकपटुता तथा वाक्- चातुर्य में भी सुधार होता है।

प्रश्न 48. लेखन शिक्षण की प्रमुख विधियां लिखिए।

अथवा

लिखने की शिक्षा के उद्देश्य वं वेखन शिक्षण की विधियाँ बताइए।

अथवा

लेखन शिक्षण के दो उद्देश्य लिखिए।

उत्तर – छात्रों को पढ़ना सिखाने के साथ साथ लिखना सिखाने के कई लाभ हैं। पहला लाभ यह है कि देखना, सुनना तथा करना – ये तीनों क्रिआएँ लिखने के साथ साथ चलती हैं। अत: लिखना और पढ़ना कौशल एक दूसरे में सहायक हो जाते हैं। दितीय लाभ यह हैं कि लिखने की शारीरिक क्रियाएँ पढ़ने को रोचक बना देती हैं।

लिखने की शिक्षा – बालक प्रारम्भिक अवस्था में अपना प्रकाशन मौखिक भाषा में ही करता है। आगे चलकर वह लिखकर अपना भावों को व्यक्त करना सीख जाता है। बालक को पहले पढ़ना सिखाया जाये और बाद में बोलना अथवा पहले ही लिखना सिखाया जाये? इस सम्बन्ध में विदानों में मतभेद हैं। मॉण्टेसरी का कहना है कि बालक को पहले लिखना सिखाया जाना चाहिए किन्तु कुछ विदान पढ़ने और लिखने की शिक्षा साथ साथ चलाने के पक्ष में हैं।

लिखने की शिक्षा के उद्देश्य – लिखने की शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • बालक को इस योग्य बनाना जिससे वह अपनी भावनाओं और अनुभूतियों को लिखकर अपने शब्दों को व्यक्त कर सके।
  • बालकों को लिखने की शिक्षा देने का एक उद्देश्य यह भी है कि वे लिखते समय यथास्थान सामासिक तथा विराम चिह्रों का प्रयोग करके लिख सकें।
  • बालकों को पढ़कर सुनकर अथवा मौखिक भाषा के माध्यम से जिन शब्दों का अर्जन कर लिया है, उनके प्रयोग करने का अवसर प्राप्त होता है। छात्र इन शब्दों का प्रयोग लिखकर कर सकते हैं।
  • बालकों ने जिस ज्ञान को प्राप्त कर लिया है, उन्हें लिखित भाषा का ज्ञान कराकर, उस ज्ञान को सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने की शिक्षा देना।
  • बच्चों को सुन्दर स्पष्ट और आकर्षक ढंग से लिखने की शिक्षा देना।
  • बच्चों को स्थायी साहित्य सृजन की शिक्षा प्रदान करना।

लिखने की शिक्षण विधियाँ

लिखने की शिक्षा प्रदान करने हेतु विदानों ने कुछ शिक्षण – विधियों का उल्लेख किया है, वे प्रमुख शिक्षण विधियाँ अग्रलिखित हैं-

  1. रेखाओं द्वारा लिखने की शिक्षा देना।
  2. मॉण्टेसरी विधि से लिखने की शिक्षा देना।
  3. अनुकरण विधि से लिखने की शिक्षा देना।
  4. पेस्टालॉजी की लिखने की शिक्षा की विधि।
  5. मनोवैज्ञानिक विधि।
  6. रेखाविधि – अधिकांशत: देखा जाता है कि बच्चे कुछ रेखाएं खीचने लगते हैं। उन्हें इस प्रकार की तिरछी पड़ी, सीधी एवं बड़ी रेखाओं में एक विशेष आनन्द की प्रप्ति होती है। अतएव बच्चों से इस प्रकार की रेखाएँ आरम्भ में खिंचवानी चाहिए। जब रेखा खींचने में उनके हाथ सधने लगें तो अक्षरों के आकार बनवाने प्रारम्भ करना चाहिए। इसे ही रेखाओं द्वारा अक्षर सिखाने की विधि कहते हैं।
  7. मॉण्टेसरी विधि – माण्टेसरी पद्धति में छोटे बच्चों को लिखने की शिक्षा देने हेतु तीन विधियों का प्रयोग किया जाता है-
  8. सबसे पहले बच्चे को लेखनी पकड़वाने का अभ्यास कराया जाता है। यह अभ्यास कार्य कागज अथवा पटटी पर रेखागणित की विभिन्न आकृतियाँ खींचकर उनमे लेखनी के द्वारा स्याहीं भरवाकर ही किया जाता है।

(ब) बालकों को अक्षरों का स्वरूप बतलाने के लिए रेगमाल कागज का प्रयोग किया जाता है। रेगमाल पर अक्षरों का स्वरूप बना रहता है। बच्चे अक्षरों के बने हुए आकार पर उँगली फेरते हैं।

(स) धीरे – धीरे उक्त रेगमाल कागज पर उँगली फेरते फेरते बालक उसकी ध्वनि का भी उच्चारण करने लगते हैं। इस क्रिया के द्वारा वे अक्षरों की ध्वनि साम्य में परस्पर सम्बन्ध स्थापित करते हैं और तब वे स्वत: लिखना शुरू करते हैं।

(3) अनुकरण विधि – अनुकरण विधि के द्वारा बच्चों को अक्षरों का ज्ञान करने हेतु अध्यापक श्यामपट्ट अथावा बच्चों की पट्टी पर बड़े आकार का सुडौल अक्षर लिख देता है। बालक अध्यापक द्वारा लिखे अक्षर की ही भाँति अक्षर लिखते हैं, धीरे धीरे इसी अनुकरण के द्वारा वे अक्षर लिखना जान जाते हैं।

(4) पेस्टालॉजी विधी – पेस्टालॉजी विधि में बालक को सरल से जटिल की ओर ले जाया जाता है। उनकों सबसे पहले अक्षरों का ही ज्ञान कराया जाता है 1 अक्षरों की आकृतिया विभिन्न टुकड़ों में बाँट ली जाती है। इसके बाद टुकड़ों के योग से पूरे अक्षरों की रचना करायी जाती है। उनकों पहले वे ही वर्ण सिखाये जाते हैं जो कि अधिक सरल होते हैं, तत्पश्चात् कठिन वर्णों की शिक्षा दी जाती है।

(5) मनोवैज्ञानिक विधि – मनोवैज्ञानिक विधि में बच्चों को सर्वप्रथम पूर्ण का ज्ञान कराया जाता है, इसके बाद अंश का ज्ञान कराते हैं अर्थात् उन्हें सर्वप्रथम पर वाक्य की शिक्षा दी जाती है, इसके पश्चात् शब्द और अन्त में अक्षरों की शिक्षा दी जाती है। एक विदान ने

इस सम्बन्ध में लिखा है कि ”बालक जब पाठशाला में प्रवेश करता है तो वह छोटे-छोटे। वाक्यों में बोलना जानता है। वर्णमाला के विभिन्न अक्षर उसके ज्ञान हेतु निरर्थक तथा सारहीन होते हैं। उनका अपने में कोई अर्थ नहीं होता। आपस में मिलकर जब वे शब्दों या वाक्यों के रूप में आते हैं, तभी वे सार्थक बनते हैं अर्थात् उनका अर्थ होता है।” अतएव शिक्षाशास्त्रियों ने इस विषय में जो प्रयोग किये हैं, उनके आधार पर बालकों को सर्वप्रथम सार्थक शब्द अथवा वाक्य ही सिखाये जाते हैं।


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प्रश्न 49. छात्रों में अपेक्षित लेखन कौशलों का विकास किस प्रकार किया जा   (बी.टी.सी. 2017) सकता है? लिखिए।

उत्तर माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक स्तर पर लिखित अभिव्यक्ति के विकास के लिए निम्नलिखित रूपों का शिक्षण तथा अभ्यास जरूरी है

(i) वर्णन, (ii) व्याख्या, (iii) संक्षेपीकरण एवं पल्लवन, (iv) पत्र लेखन, (v) संवाद लेखन, (vi) रिपोर्ट लिखना, (vii) पुस्तक समीक्षा, (viii) जीवनी, (ix) आत्मकथा, (X) निबन्ध रचना, (xi) एकांकी लेखन, (xii) कहानी लेखन, (xiii) कविता लेखन।

प्रश्न 50. छात्रों के अशुद्ध उच्चारण सुधार हेतु ध्यान देने वाले बिन्दुओं का (बी.टी.सी. 2017) उल्लेख कीजिए।

उत्तर—उच्चारण को शुद्ध करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनायें

(i) प्रतिभागियों के समक्ष शुद्ध भाषा का प्रयोग किया जाये तथा उन्हें शुद्ध उच्चारित भाषा सुनने का अधिक-से-अधिक अवसर प्रदान किया जाये।

(ii) प्रतिभागी यदि किसी शब्द का शुद्ध उच्चारण करने में असमर्थ हो तो उस शब्द का खण्ड-खण्ड उच्चारण अभ्यास कराया जाये।

(iii) ऋ, श, ष, ज्ञ वर्षों से बने शब्दों के शुद्ध उच्चारण का अभ्यास कराया जाये।

(iv) ध्वनियों के उच्चारण स्थान से परिचित कराकर उसी के अनुसार उच्चारण अभ्यास कराया जाये।

(v) ध्यान रखना चाहिए कि पढ़ते अथवा बोलते समय मध्य में टोकने की बजाय बोलना/पढ़ना समाप्त होने के बाद अशुद्ध शब्द के उच्चारण का संशोधन करना चाहिए।

(vi) आदर्श उच्चारण के उदाहरण टेप-रिकॉर्डर की मदद से भी प्रस्तुत किये जा सकते हैं। ऐसे टेप पहले से तैयार रहने चाहिए। उन्हें सुनाकर फिर प्रतिभागियों से उसी प्रकार उच्चारण करने हेतु कहा जाये।।

(vii) ड, ढ़ के उच्चारण का अभ्यास कराया जाए। (viii) संयुक्ताक्षरों के उच्चारण पर ध्यान दिया जाये, यथा

क्षमा—क् + s = क्ष ।

ज्ञानज् + ञ् = ज्ञ

प्रश्न 51. हिन्दी शिक्षण में श्रव्य-दृश्य साधनों के प्रयोग से क्या लाभ हैं ? स्पष्ट (बी.टी.सी. 2016). कीजिए।

उत्तर-हिन्दी शिक्षण में श्रव्य-दृश्य साधनों से निम्न लाभ हैं

  • पाठ का जो अंश व्याख्यान आदि के द्वारा स्पष्ट नहीं किया जा सकता, उसे अंश | चित्र वगैरह के माध्यम से सरलता से समझाया जा सकता है।
  • देखने का प्रभाव सुनने की अपेक्षा अधिक पड़ता है और मॉडल, चित्र आदि सभी दृश्य हैं।
  • दृष्टान्त, लघु-कथा वगैरह स्वतः ही रोचक होते हैं और जो बात रुचिकर होती है, | उसके माध्यम से किसी भीति को शीघ्र ही सीखा जाता है।
  • साहित्य शिक्षण में जब तक अन्तर्कथाओं को स्पष्ट न किया जाये, तब तक न तो । पाठ ही रुचिकर बन पाता है और न ही समझ में आता है।
  • सहायक साधनों द्वारा पाठ को समझाने में अपेक्षाकृत कम समय लगता है।
  • इनके द्वारा छात्रों की विचार एवं कल्पना दोनों का विकास किया जा सकता है।

इन्हीं दृष्टियों से किसी पाठ को समझाने के लिए शिक्षण में सहायक साधनों की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 52. कविता शिक्षण के विशिष्ट उद्देश्य लिखिए। ( बी.टी.सी. 2016)

उत्तर–कविता शिक्षण के विशिष्ट उद्देश्य कविता की शिक्षा का प्रधान उद्देश्य छात्रों में सौन्दर्यात्मक भावनाओं का विकास करना होता है। अतएव काव्य शिक्षण के अन्य | और भी उद्देश्यों से परिचय प्राप्त कर लेना आवश्यक है। ये उद्देश्य निम्नलिखित हैं।

(i) उचित स्वर एवं प्रवाह के साथ कविता पठन की क्षमता पैदा करना।

(ii) छात्रों में इतनी क्षमता उत्पन्न करना कि जिससे वे काव्य के सौन्दर्य को परख सकें तथा किसी भाव-प्रधान कविता का रसास्वादन प्राप्त कर सकें। रायबर्न महोदय ने इस सम्बन्ध में लिखा है, ”हमारा उद्देश्य यह होता है कि विद्यार्थी भी कवि की अनुभूति को समझें और ग्रहण कर सकें। अध्यापक का यह कार्य हो जाता है कि उससे छात्र कवि के | प्रकृति के प्रेम को समझ सकें और उनकी कविता में उनको भी रसानुभूति प्राप्त हो।”

(iii) किसी कवि के भाव और शैली से छात्रों को परिचित कराना।

(iv) छात्रों में कविता के भाव समझ सकने की क्षमता उत्पन्न करना तथा अपने शब्दों में कवि के भावों को व्यक्त करने की क्षमता पैदा करना।

(v) छात्रों की कल्पना-शक्ति एवं भाव के समीक्षा कर सकने की शक्तियों का विकास | करना।

(vi) भाई योगेन्द्रजीत ने कविता शिक्षण के उद्देश्य के सम्बन्ध में लिखा है कि हमारे | आस-पास के वातावरण में कितने ही रमणीय दृश्य हैं। लोगों को वे रम्य नहीं लगते। इसका प्रधान कारण यह है कि लोगों के पास रमणीयता का शोधन करने वाली दृष्टि का अभाव है। इसी अभाव के कारण वे कितने ही आनन्द को ग्रहण नहीं कर पाते । कविता के अध्यापन का भी यही ध्येय है वह सौन्दर्य बोधक दृष्टि विद्यार्थियों में उत्पन्न की जाये जिससे वे संसार रूपी उद्यान में विहार करते समय अनेक प्रकार के स्थलों का आनन्द ले सकें।”

(vii) छात्रों को काव्य शिक्षण के साथ ही रस, छन्द और अलंकार से परिचित कराना। छात्रों की कविता की अनेकानेक शैलियों से परिचित कराना।

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प्रश्न 53. अनुस्वार तथा अनुनासिक ध्वनियों में क्या अन्तर है ? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।    (बी.टी.सी. 2016)

उत्तर-  अनुस्वार तथा अनुनासिक ध्वनि ।

अनुस्वार (-)–अनुस्वार के उच्चारण में वायु नाक से निकलती है और उच्चारण झटके के साथ होता है। जैसे—ठंडा, कंचन, जंगल, चंपत, अंतर आदि।

अनुनासिक ( -ँ ) -अननासिक के उच्चारण में वायु नाक और मुख दोनों ने निकलती है। जैसे–चाँद, बूंद, कुँवर, आँख  आदि।

प्रश्न 54. लिखना सिखाने में ध्यान देने योग्य दो बिन्दुओं का उल्लेख कीजिए।            (बी.टी.सी. 2016)

अथवा

लेखन शिक्षण की दो विशेषताएँ बताइए। उत्तर लिखना सिखाने में ध्यान देने योग्य बातें ।

(i) बैठने का ढंग – बच्चों को लिखना सिखाने के पूर्व सीधे बैठने का अभ्यास करना आवश्यक है। झुककर बैठने से रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो जाती है। इसके अलावा आँखों पर अधिक बल पड़ता है। यदि चौकी, पोढ़ा, टेबल आदि न हो तो भूमि पर बायाँ घुटना मोड़कर, बज्रासन में बैठकर दायें कन्धे पर स्टेल अथवा कॉपी रखकर लिखना चाहिए। कॉपी किसी आधार पर रखनी चाहिए एवं आधार भी सीधा होना चाहिए। कॉपी को टेढ़ा करके लिखना गलत आदत है।

(ii) दूरी—सीधे बैठकर पटिया, स्लेट अथवा कॉपी को आँखों से 35 सेण्टीमीटर या 14 इंच की दूरी पर रखकर लिखना चाहिए।

(iii) कलम पकड़ने के तरीके–  कलम को उचित ढंग से पकड़ा जाये। कलम तर्जनी मध्यमा और अंगूठे के बीच हो और बीच से एक इंच ऊपर हो। बच्चे द्वारा कलम इस प्रकार पकड़ी जाये कि अँगुलियों को वर्गों के आकार के अनुसार घुमाया-फिराया जा सके। हाथ को कनिष्ठिका के सहारे पुस्तिका पर घुमाया जाना चाहिए। हाथ की कुहनी शरीर की ओर ही रहनी चाहिए इसे दूर करके तिरछे ढंग से चलना उचित नहीं है। लिखते समय कलाई घुमाने की जरूरत नहीं पड़ती। कलाई लेखन के साथ आगे चलाया जाना चाहिए। हथेली को तभी पीछे हटाना चाहिए, जब नवीन पंक्ति आरम्भ करना हो। |

(iv) शिरोरेखा– वर्गों के ऊपर लगायी जाने वाली रेखा को शिरोरेखा कहा जाता है। वर्गों पर शिरोरेखा का प्रयोग अवश्य होना चाहिए। शिरोरेखा की लम्बाई पूरे वर्ण के दोनों ओर वर्ण की चौड़ाई की 1/3 निकली होनी चाहिए। वर्ण बायें से दाहिने की ओर लिखे जाते हैं। वर्ण पर शिरोरेखा लगाने के पश्चात् मात्रा लगानी चाहिए।

(v) अक्षर की सुडौलता देवनागरी लिपि में प्रत्येक अक्षर को बनाने का एक विशेष ढंग है। जब अक्षर उचित तरीके से बनाया जाते हैं तो वे देखने में सुन्दर, सुडौल लगते हैं। उदाहरण के लिए

(1) ‘क’ वर्ण को बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘क’ के मध्य को पाई के

बायीं ओर का भाग पाई के बीचों-बीच और शंडिका दाहिनी ओर मध्य भाग से निकालकर मध्य पाई के बराबर लटकाई जायेगी। बायें और दायें दोनों ओर की

मोटाई बराबर होनी चाहिए।

(2) इसी प्रकार ‘ख’ बनाते समय यह ध्यान रखना होगा कि ‘ख’ में ‘र’ का निचला

शिरा ‘व’ के निचले भाग से जोड़कर ‘ख’ अक्षर बनेगा।’ख’ शुद्ध रूप है तथा – ‘रव’ अशुद्ध रूप।

(3) ‘ग’ में एक छोटी और दूसरी उससे थोड़ी बड़ी पाई और छोटी लाइन में एक गोल

घुण्डी बनेगी–| ग ग ग

(4) घ वर्ण को बनवाने  हेतु घ के दो मोड़ों में पहला मोड़ पाई के आधे भाग और दूसरा मोड़ भई आधे भाग से आरम्भ होकर नीचे की खड़ी पाई से थोड़ा ऊपर ही रहेगा। इसकी अन्त पाई दोनों मोड़ों से थोड़ा सा नीचे रहेगीं।

(5) ‘ड’ को आकृति 3/4 भाग में ही होगी।

(6) ‘च’ पाई के बीच भाग में लिखा जाता है।

(7) छ’ का पहला मोड के अर्द्धभाग और दूसरा मोड़ मध्य |से ऊपर निचली पंक्ति को छूता हुआ नीचे से ऊपर की ओर जाकर मध्य। के मोड़ को स्पर्श करता हुआ पुन: नीचे की ओर मुड़ जाता है।

(8) ठ को आकति 1/3 भोड़ के पश्चात् वृत्ताकार होकर नीचे की पंक्ति को स्पर्श करती होनी चाहिए। इसी गोलाकार भाग के ठीक नीचे से स्पर्श कराकर ‘उ’ अथवा ‘ऊ’ को मात्रा लगानी चाहिए।

(9) ‘थ’ और ‘भ’ में गोल घुण्डी शिरोरेखा के बराबर लाकर थोड़ा ऊपर अन्त पाई के बीच के बराबर में घुमाकर अन्त पाई में जोड़ देते हैं।

इस प्रकार समस्त आकतियों को सही तरीके से लिखने से ही लिपि में सुडौलता आती है। चतु:स्तरीय लेखन से वणों को उचित अनुपात में लिखना आसान होता है ।।

ऊपर और नीचे खाने में मात्राओं के लिए स्थान होता है।

(i) उचित दूरी–वण, भात्राओं, शब्दों, पंक्तियों आदि की उचित दूरी लेख में सौन्दर्य लाती है।

(1) वणों को दूरी–वर्ण से वर्ण के मध्य एक पाई ‘।’ की दूरी होनी चाहिए; जैसे”अब।

2) वर्ण और मात्रा के मध्य में भी एक पाई दूरी होनी चाहिए; जैसे राम।

(3) शब्द से शब्द के बीच की दूरी ‘दो पाई’ के बराबर होनी चाहिए; जैसे—राम सीता।

(4) दो वाक्यों के मध्य की दूरी विराम चिह्नों को छोड़कर चार पाई की दूरी के बराबर होनी चाहिए, यथा-राकेश आओ। मोहन आओ। |

(5) एक पंक्ति से दूसरी पंक्ति की दूरी इतनी हो कि ऊपर की पंक्ति के वर्ण के नीचे लगी मात्राएँ और नीचे की पंक्ति की शिरोरेखा के ऊपर लगी मात्राएँ परस्पर नहीं मिलें तथा उनके मध्य कुछ स्थान बचा रहे।

(6) विराम चिह्रों की दूरी दो पाई की दूरी के बराबर होनी चाहिए; जैसे-रुक्मिणी ! तुम आओ।

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