DElEd 1st Semester Hindi Short Question Answer in Hindi

प्रश्न 7. ‘उच्चारण स्थान की दृष्टि से व्यंजन भेद बताइए।

अथवा ।

उच्चारण स्थान एवं वर्गों का वर्गीकरण कीजिए।

उत्तर—छात्रों को उच्चारण स्थान अर्थात् उचित ध्वनि निर्गम से परिचित कराना जरूरी है ताकि वे उच्चारण सम्बन्धी भूल न करें। उच्चारण वर्गों का वितरण अग्र प्रकार दिया गया

नाम स्थान स्वर व्यंजन
कण्ठ्य तालव्य मूर्धन्य दन्त्य ओष्ठ्य अनुनासिक कण्ठ तालु मूर्धा दाँत ओष्ठ नासिका अ, अ: इ, ई ऋ   ऊ, उ अं क, ख, ग, घ च, छ, ज, झ, य, श ट, ठ, ड, ढ, र, ष त, थ, द, ध, ल, स प, फ, ब, भ, म ड़, ञ, ण, न, म

प्रश्न 8. अनुनासिक ध्वनियों का संकेत क्या है ?

उत्तर- अनुनासिक ध्वनियों के संकेत हैं—अं, इं, अं।

अँ को अनुनासिक ध्वनि इसलिए कहते हैं क्योंकि इसकी उत्पत्ति में नासिका भूमिका महत्वपूर्ण होती है। अनुनासिक वह नासिक ध्वनि है जिसका संकेत है जल बिना किसी बाधा के नासिका से उच्चारित हो तब ये स्वर अनुनासिक कहलाते हैं।

जैसे-हँस, यहाँ, वहाँ, कहाँ, झाँसी।।

कुछ ध्वनियों में कभी-कभी स्वत: अनुनासिकता आ जाती है। ऐसा बोलने के प्रवाह में सुविधा के कारण होता है। उदाहरणार्थ_’सर्प’ शब्द में ‘सॉप’ निष्पन्न हुआ। कछ अनुनासिकता तो सकारण होती है वहाँ अनुनासिकता का आना स्वाभाविक लगता है; जैसे ऊष्ट्र > ऊँट, कूप > कुआँ, अश्रु > आँसू, सत्य > साँच, चन्द्र > चाँद आदि।

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प्रश्न 9. स्वर मुख्यतः कितने प्रकार के होते हैं ? उत्तर–स्वर के प्रकार–स्वर मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं

(i) ह्रस्व स्वर—जिन स्वरों के उच्चारण में कम समय लगता है, उन्हें ‘हस्व स्वर’ कहते हैं। ये चार हैं—अ, इ, उ, ऋ।।

(ii) दीर्घ स्वर–दीर्घ स्वर उन स्वरों को0 कहते हैं जिन स्वरों का उच्चारण करते समय ह्रस्व स्वर की अपेक्षा अधिक समय लगता है। आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ आदि ‘दीर्घ स्वर’ कहलाते हैं।

(iii) प्लुत स्वर–प्लुत स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व एवं दीर्घ स्वरों से तीन गुना अधिक समय लगता है। किसी को पुकारने में या नाटक के संवादों में इनका प्रयरोग किया जाता है; जैसे—ओम्, राम आदि।

प्रश्न 10. वर्गों को लिखते समय क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए ?

उत्तर–वर्गों को लिखते समय रखी जाने वाली सावधानियाँ—अधिकतर छात्र, | अध्यापक तथा अभिभावक सभी वर्गों को ठीक प्रकार से नहीं लिख पाते, जो वर्ण ठीक

प्रकार नहीं लिख पाते अथवा लिखने में गलती कर देते हैं, उनका वर्णन निम्न प्रकार है।

(i) अ, आ, ओ, औ, अं, अ:, थ, ध, भ को ध्यान से देखें तो ये समस्त वर्ण ऊपर से खुले रहते हैं। छात्र इन वर्गों को लिखते समय उनके ऊपर पूरी लकीर खींच देते हैं। जैसे थ के ऊपर पूरी लकीर खींचने से य तथा ध के ऊपर पूरी लकीर खींचने से घ के समान बन जाता है।

(ii) ख को रब लिखा जाता है जो कि पूर्ण न रहकर शब्द बन जाता है। इसलिए ख में निचला हिस्सा क दूसरे से मिला रहना चाहिए।

(iii) घ ऊपर से बन्द तथा ध ऊपर से खुला रहना चाहिए।

(iv) छ को गोलाई में लिखना चाहिए नहीं तो 6 के अंक जैसा प्रतीत होता है।

(v) थ ऊपर से खुला और य ऊपर से बन्द करके लिखना चाहिए।

(vi) भ ऊपर से खुला तथा म ऊपर से बन्द करके लिखना चाहिए।

(vii) इसी प्रकार न, र, ल, श, स, ह को भी ध्यान से लिखना चाहिए।

प्रश्न 11. उच्चारण थान के आधार पर व्यंजन का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर-  उच्चारण स्थान के आधार पर व्यंजन दो प्रकार के होते हैं—सघोष तथा अघोष ।

साप व्यंजन सघोष व्यंजन वे व्यंजन कहलाते हैं, जिनमें व्यंजन का उच्चारण उस समय के समाप्त नहीं होता, जब तक जिल्ला उस स्थान तक पहुँचती है, जहाँ से व्यंजन का अारण होता है। इसके दो भेद हैं—पूर्ण सघोष व अपूर्ण सघोष; जैसे—अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ,ए, ऐ,  ओ, ऑ, ग, घ, ज, झ, ड, ढ, द, ध, व, भ, य, र, ल, व तथा है। अपूर्ण घोष में घोष जारी नहीं रहता। यह घोष उच्चारण के आदि, मध्य तथा अन्त भाग में होता है ।

उच्चारण स्थान की दृष्टि से व्यंजन ध्वनियों के निम्नांकित भेद हैं। | (i) द्वयोष्ठ्य इन अक्षरों के उच्चारण में दोनों ओष्ठों का प्रयोग होता है—प, फ, ब, श, म, व तथा उ, ऊ।

(ii) दन्त्योष्ठ्य–इन वर्गों के उच्चारण में, ऊपर के दाँत तथा नीचे के होंठ का प्रयोग किया जाता है व, फ।।

(iii) दन्त्य–जिन व्यंजनों के उच्चारण में जिह्वा को दाँतों पर लगाना होता है, उन्हें दन्त्य कहा जाता है; जैसे—त वर्ग, ल, स।।

(iv) कण्ठ्य -कण्ठ से बोले जाने वाले वर्षों को कण्ठ्य कहा जाता है; जैसे—अ, आ, क वर्ग, ह।

(v) तालव्य -जिन वर्णो के उच्चारण में जिह्वा तालु को स्पर्श करती है, उन वर्गों को तालव्य कहते हैं; जैसे इ, ई, च वर्ग, य, श। | (vi) मूर्द्धन्य-जिन वर्णो का उच्चारण जिह्वा को मूर्ख पर लगाने से होता है, उन्हें मूर्द्धन्य कहते हैं; जैसे—ऋ, ट वर्ग, र, ष। । (vii) जिह्वामूलीय—जिन वर्गों के उच्चारण में जिह्वा के मूल का स्पर्श होता है, उन्हें जिह्वामूलीय0 कहते हैं; जैसे—क, ख, ग।

2. अघोष व्यंजन-अघोष व्यंजन वे व्यंजन होते हैं, जिन वर्गों के उच्चारण में नाक का प्रयोग नहीं किया जाता अर्थात् वायु को निकलने में कोई प्रयास नहीं करना पड़ता।

शब्द विलोम शब्द विलोम
कायर वीर अन्धकार प्रकाश
अमृत विष यश अपयश
रात दिन गर्मी सर्दी
घृणा प्रेम  अपना पराया
आदि अन्त राजा रंक
रक्षक भक्षक चतुर मूर्ख
जय पराजय अनुकूल प्रतिकूल
आरम्भ अन्त विष अमृत
हार जीत पाप पुण्य

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