DElEd 1st Semester Science 3rd 4th Science Short Question Answer Paper

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प्रश्न 60. प्रकन्द तथा अन्त:भूस्तारी को चित्रों की सहायता से प्रदर्शित कीजिए। (बी.टी.सी. 2015 II)

उत्तर–प्रकन्द (Rhizome)-प्रकन्द भूमि में शयान स्थिति में रहते हैं, इनका अक्ष भूमि की सतह के क्षैतिज रहकर समानान्तर वृद्धि करता है, यह अनियमित आकार, माँसल

तथा चपटे होते हैं। इस पर पर्व व पर्वसन्धियाँ होती हैं, पर्व पर शल्क-पर्ण होते हैं। इसके निचले भाग से अपस्थानिक जड़े निकलती हैं। उदाहरण-अदरक, हल्दी, अरबी इत्यादि। । अन्त:भूस्तारी (Sucker)-कुछ पौधों में वायव तने का आधार भाग भूमिगत होता है। इस भाग की कक्षस्थ कलिकाओं से जो शाखाएँ निर्मित होती हैं वे भूमि के कुछ दूर तक तिरछी अथवा क्षैतिज स्थिति में वृद्धि करती जाती हैं और अन्तत: भूमि के ऊपर निकलकर एक वायव प्ररोह बन जाती हैं। इन शाखाओं को अन्त:भूस्तारी कहा जाता है। इनकी पर्वसन्धियों से अपस्थानिक जड़े तथा अन्य अन्त:भूस्तारी परिवर्धित हो जाते हैं। अन्त: भूस्तारी के पितृ-पादप से पृथक् हो जाने पर एक स्वतन्त्र पादप बन जाता है। अन्त:भूस्तारी, उपरिभूस्तारी से छोटा होता है। गुलदाउदी, पुदीना, आदि पौधे अन्त:भूस्तारी पौधों के उदाहरण हैं।

प्रश्न 61. पुष्प के कितने भाग होते हैं ? उनके भागों का चित्र बनाकर कार्य संक्षेप में बताइए। (बी.टी.सी. 2016)

उत्तर  पुष्प के भाग

(Parts of Flower) पुष्प वास्तव में पत्तियों का ही रूपान्तरण होता है। यह अपने डण्ठल के पुष्पासन पर लगा रहता है। इसे पुष्प वृन्त कहा जाता है। पुष्प का जन्म कली से होता है, जो कि हरी पत्तियाँ निपत्रों से ढंकी रहती हैं। इन पत्तियों को बाह्यपुट चक्र कहते हैं। प्रारूपिक पुष्प के प्रमुखतः चार प्रकार के अंग होते हैं, जो पुष्पासन पर लगे रहते हैं। यह चार अंग चक्रों में लगे रहते हैं। इन अंगों के प्रत्येक भाग को पुष्प कहा जाता है। चारों चक्रों में से नीचे के दो चक्र सहायक एवं ऊपर के दो चक्र बाह्यपुट कहलाते हैं।

पुष्प के निम्नलिखित भाग हैं

(i) बाह्यदल पुंज (Calyx)- बाह्यदल पुंज पुष्प के खिलने से पहले आन्तरिक अंगों की रक्षा करते हैं। पुष्प खिलने के उपरान्त यह भोजन निर्माण का कार्य करते हैं। रंगहीन बाह्यदल पुंज, दलपुंज का भी कार्य करते हैं। कभी-कभी यह फलों के प्रकीर्णन में भी मदद देते हैं। यह रोमदार रचना में बदल जाते हैं तब इन्हें रोम गुच्छ कहा जाता है।

(ii) दलपुंज (Corolla)—यह परागण हेतु कीटों को आकर्षित करते हैं। हरा दलपंज भोजन निर्माण का कार्य भी करता है। यह पुंकेसर एवं अण्डप की रक्षा करते हैं।

(iii) पुमंग (Androecium)- इसका कार्य परागकण पैदा करना है।

  • जायांग (Gynoecium)-स्त्रीलिंग चक्र में वर्तिकाग्र का कार्य परागकणों को ग्रहण करना है। वर्तिका का कार्य परागनली को अण्डाशय तक पहुँचाना है।

प्रश्न 62. बीजों की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए। मूलांकुर तथा प्रांकुर से (बी.टी.सी. 2016) क्या बनता है?

बीजों की संरचना उत्तर

(Structure of Seeds) सेम का बीज कुछ बड़ा होता है इसलिए इसके सभी भागों का अध्ययन अच्छी तरह किया जा सकता है। सेम के बीज को ध्यान से देखो। यह आकार में प्रायः मनुष्य के गुर्दे की भाँति होता है। बीज के ऊपर एक आवरण है जिसे बीजचोल कहा जाता है। यह बीज को सूखने से अथवा अन्य हानिकारक परिस्थितियों से सुरक्षित रखता है। विभिन्न जातियों के सेम के बीजों का आवरण का रंग सफेद या हल्का या गहरा भूरा होता है। यह प्रायः चिकना होता है। बीज के अवतल भाग में एक अण्डाकार चिह्न है जिसे नाभिका कहा जाता है। यह सेम के बीज का वह भाग है जहाँ यह फलभित्ति के साथ जुड़ा होता है। नाभिक के एक ओर एक छोटा छिद्र है जिसे बीजाण्डद्वार कहा जाता है।

चित्र–सेम का बीज तथा उनके भाग

सेम के कुछ सूखे बीजों को रात भर के लिए पानी में भिगो दो। अगले दिन प्रात:काल बीज पानी सोखकर फूल जायेंगे। इन बीजों को कपड़े अथवा सोख्ता कागज पर सुखा लो।

अब एक बीज को दबाओ। तुम्हें बीजाण्डद्वार से पानी निकलता दिखायी देगा। सुई अथवा चिमटी की मदद से बीजों के बीजचोल को पृथक् करो, तुम्हें बीजचोल के अलग करने पर एक संरचना दिखायी देगी जिसे भूण कहते हैं, भ्रूण से ही नया पौधा बनता है। भ्रूण का अध्ययन करने पर सर्वप्रथम गुर्दे के आकार के दो बीजपत्र दिखायी देंगे जो कि एक-दूसरे के साथ चिपके रहते हैं। सेम के दो बीजपत्रों में से एक बीजपत्र हटाओ। जहाँ बीजपत्र जुड़े होते हैं वहाँ भ्रूण के अन्य भाग दिखायी देंगे। इन्हें मूलांकुर तथा प्रांकुर कहते हैं। मूलांकुर से जड़ (मूल) बनती है तथा प्रांकुर से तना (प्ररोह) बनता है। भ्रूण अपना भोजन तैयार नहीं कर सकता, यह बीजपत्रों में संचित भोजन पर निर्भर रहता है। सेम, मटर, चना और इमली के बीजों के भ्रूण में दो बीजपत्र होते हैं। ऐसे पौधों को द्विबीजपत्री पौधे कहा जाता है।

प्रश्न 63. गुरुत्व बल तथा पेशीय बल को उदाहरण द्वारा समझाइए। ( बी.टी.सी. 2016) उत्तर

बल के प्रमुख प्रकार

(Main Types of Force)

बल निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

(i) पेशीय बल– जब हम किसी वस्तु को हाथ से उठाते हैं तो हमारे हाथों की माँसपेशियों में खिंचाव पैदा होता है। हाथ की माँसपेशियों पर उत्पन्न खिंचाव द्वारा वस्तु पर बल लगाया जाता है। पेशियों द्वारा लगाए गए इस बल को पेशीय बल कहा जाता है। बैलों द्वारा गाड़ी को खींचना, पानी से भरी बाल्टी उठाना, किसी वस्तु को हथौड़े से पीटना, टमाटर को दबाना आदि बल के ही उदाहरण हैं।

(ii) गुरुत्वीय बल-पृथ्वी, पत्थर के टुकड़े को अपने केन्द्र की ओर आकर्षित करती है। पृथ्वी के इस आकर्षण बल को गुरुत्व बल कहा जाता है। सभी वस्तुओं पर गुरुत्व बल कार्य करता है। पृथ्वी प्रत्येक वस्तु को अपने केन्द्र की ओर खींचती है।

(iii) चुम्बकीय बल–चुम्बक लोहे की कीलों को अपनी ओर खींच लेता है। चुम्बक द्वारा कीलों पर लगाये बल को चुम्बकीय बल कहा जाता है। किसी चुम्बक द्वारा किसी अन्य चुम्बक एवं चुम्बकीय पदार्थों पर लगाया गया बल चुम्बकीय बल कहलाता है।

(iv) विद्युतीय बल–विद्युतीय बल के कारण भी आकर्षण बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, यदि प्लास्टिक के स्केल को सूखे बालों से रगड़ कर कागज के टुकड़ों के पास ले जायें तो कागज के टुकड़े प्लास्टिक के स्केल की ओर आकर्षित होने लगते हैं। ऐसा विद्युतीय बल लगने के कारण होता है।

  • घर्षण बल–यदि बहुत तेजी से दौड़ते हुए आपका पैर अचानक केले के छिलके पर पड़ जाए तो आप गिर पड़ेंगे। यदि सिल बट्टा के दाँते घिस जायें, यदि आटा-चक्की के पट्टे घिस जाएँ तो क्या होगा? चक्की गति नहीं करेगी। घर्षण बल की मात्रा बहुत कम होने के कारण ऐसा होता है।

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