DElEd 1st Semester Science 3rd 4th Science Short Question Answer Paper

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प्रश्न 7. पौधों में जड़ों के भागों के रूपान्तरण का वर्णन कीजिए।

उत्तर – (i) शंकुरूप (Conical)-यह जड़ ऊपर से चौड़ी फिर नीचे से पतली होती जाती है; जैसे-गाजर (Daucus) ।

(ii) कुम्भीरूप (Napiform)-इस प्रकार की जड़ों में ऊपर का भाग घड़े के समान फूला और निचला भाग एकदम पतला हो जाता है; जैसे—शलजम (Brassica rapa) ।

(iii) तरूप (Fusiform)-तरूप जड़ मध्य से फूली हुई परन्तु दोनों सिरों पर पतली होती है; जैसे—मूली (Raphants) ।

अपस्थानिक जड़ (Adventitious root)-जब जड़ मूलांकुर के अलावा पौधे किसी और स्थान से विकसित होती है तब अपस्थानिक जड़ कहलाती है। अल्प आयु जड़ों के समाप्त होने पर भी अपस्थानिक जड़े निकलती रहती हैं।

(i) रेशेदार (Fibrous)-जड़े बहुत पतली तथा जन्तु के समान होती हैं।

(ii) कंद गुच्छ (Tuberous or fasciculated)–कन्द जड़ों में भोजन संचित होने के कारण ये फूल जाती हैं तथा गुच्छे बना लेती हैं; जैसे-शकरकन्द (Sweet potato) एवं एस्पेरागस (Asparagus) आदि।

(iii) ग्रन्थिमय (Nodulose)-जिन जड़ों के सिरे फूल जाते हैं उन्हें ग्रन्थिमय जड़ें कहा जाता है; जैसे—मेलीलोटस (Melilotus) ।

(iv) जटा मूल (Stil roots) – जब पर्व सन्धिों से जड़े निकलकर भूमि की ओर बढ़ती है तथा भूमि के अन्दर घुसकर रस्सीनुमा संरचना निर्मित कर लेती है तो वह जटा मूल जड । कहलाती है, जैसे मका।।

(v) मणिरूपाकार (Beated or Moniliform)- जब जड़ एक निश्चित अन्तर के बन्द मोती की भांति फुलती है, तो वह मणिरूपाकार कहलाती है; जैसे-वाइटस (Vitius)।

(vi) आरोही मूल (Climbing roots)- आरोही जड़े पर्वसन्धियों पर निकलती हैं और आरोही को चढ़ने में सहायता करती हैं, जैसे मनी प्लाण्ट, मोन्स्टेरा आदि।।

(vii) श्वसन जड़े (Respiratory roots) ये जड़े लवणोभिद् पौधों में पायी जाती हैं। भूमि में जब हवा ( ऑक्सीजन) की कमी होती है तब श्वसन की क्रिया करने हेतु कुछ जड़े भूमि से ऊपर निकलकर श्वसन करने लगती हैं, इन्हें श्वसन जड़ें कहा जाता है; जैसे – एवीसीनिया (Avicennia), जूसिया (Jussiea)

(vii) स्तम्भ मूल (Prop roots) – जब जड़े शाखाओं से निकलकर भूमि में चली जाती हैं तथा पेड़ को स्तम्भ की भाँति दृढ़ता प्रदान करती हैं, तो वे स्तम्भ मूल जड़ें कहलाती है; जैसे बरगद।।

(ix) उपरिरोही जड़ें (Epiphytic roots)-पादपों में वायवीय जड़े मिलती हैं। इन जड़ों में वेलामन ऊतक पाया जाता है। यह वेलामन वायु से नमी सोख लेता है; जैसे आर्किड की जड़े।

(X) पर्णिल जड़े (Foliar roots)- जब पत्तियों से जड़े निकलती हैं तो यह जड़ें। पर्णिल जड़ें कहलाती हैं; जैसे—पत्थरचट (Bryophyllium) ।

(xi) परजीवी जड़े (Sucking or haustorial roots)-परजीवी जड़ें पोषक तने में। घसकर भोजन का चूषण करती हैं; जैसे-डेन्ड्रोप्थी (Dendrophtho०)।।

(xii) परवयाकार (Annulated)- कुछ पौधों की जड़ों में वलयाकार रचनाएँ पायी जाती हैं, जैसे-आर्किड। |

प्रश्न 8. पुष्प के विभिन्न अंग बताइए।

अथवा

पुष्प के कितने भाग होते हैं ? उनके भागों के चित्र बनाकर कार्य संक्षेप में लिखिए। (बी.टी.सी. 2016)

उत्तर – पुष्प के विभिन्न अंग (Different Parts of Flower) (i) बाह्रादलपुंज {Calyx) यह पुष्प का सबसे बाहरी चक्र होता है। इसकी प्रत्येक इकाई को बाह्यदल (sepal) कहते हैं। यह कली (bud) में जननांगों की सुरक्षा करने का कार्य करता है।

(i) दलपुंज (Corolla) -यह दलपुंज का दूसरा चक्र है तथा यह बाह्यदलपुंज के भीतर की ओर होता है। यह रंगीन तथा सुन्दर होने के कारण इसका मुख्य कार्य परागपा शेत कीड़ों को आकर्षित करना है। इसकी इकाई को दल (petal) कहते हैं।

(iii) परिदलपंज (Perianth)-जिन पुष्पों में बाह्यदलपुंज तथा दलपुंज में अन्तर अस्पष्ट होता है, यह परिदलपुंज कहलाते हैं। इनकी इकाई को परिदल कहा जाता है।

परिदलपुंज रंगीन होने पर दलाभ (petaloid) या रंगहीन होने पर सेपलोइड अथवा बादलाभ (sepaloid) कहलाता है।

बीजाण्ड प्रारूपी पुष्प की अण्डाशय की अनुप्रस्थ काट (iv) पुष्पवृन्त (Pedicel)- पुष्य जिस डंठल, तने अथवा शाखा से जुड़ा होता है, उसे । पुष्पवृन्त कहते हैं।

(v) पुष्पासन (Receptacle or Thalamus)-पुष्पवृन्त का अग्रस्थ भाग पुष्पासन होता है। इसके ऊपर पुष्प के अन्य भाग लगे हुए होते हैं। । (vi) जायांग (Gynoecium, Gyne-female)-यह पुष्प का चौथा अन्तिम चक्र है। तथा सबसे सुरक्षित भीतरी भाग है जिसकी इकाई स्त्रीकेसर (carpel or pistil) या अण्डप कहलाती है। यह पुष्प का मादा जननांग हैं जिसमें अण्डप (ovule or megasporophyll) तीनों भागों से मिलकर बनता है। इसके निचले भाग अण्डाशय, बीजाण्ड होते हैं। अण्डाशय से जुड़ी एक पतली नलीनुमा संरचना होती है जिसे वर्तिका कहा जाता है। इसके अन्त में वर्तिकाग्र (stigma) स्थित होता है।

(vii) पुमंग (Androecium, Andros-male)-पुंकेसरों के समूह को पुमंग कहा जाता है। पुंकेसर पुष्प का नर जननांग होता है। प्रत्येक पंकेसर को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है— लम्बी पुतन्तु, अग्रस्थ परागकोश तथा दोनों को जोड़ने वाली योजि।।

प्रत्येक परागकोश में एक या दो कोष्ठ और प्रत्येक कोष्ठ में दो परागधानियाँ होती हैं। इस प्रकार एक द्विकोष्ठी परागकोश में चार परागधानियाँ मिलती हैं।

वर्तिकाग्र का कार्य परागकणों को ग्रहण करना होता है। इन परागकणों से जो पराग नली निकलती है वह वर्तिका से होकर बीजाण्ड तक पहुँचती है।

प्रश्न 9. बीजाण्डन्यास से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रकार बताइए।

उत्तर- बीजाण्डन्यास से आशय (Meaning of Placentation) बीजाण्डासन पर तथा बीजाण्डासन का अण्डाशय में हुआ अभिविन्यास जी कहलाता है। यह निम्न प्रकार के होते हैं

(i) सीमान्त (Marginal)-सीमान्त में जायांग एकअण्डपी या बहुअण्डपी (mono- carpellary or multicarpellary) मुक्ताअण्डप होता है एवं इसमें बीजाण्ड के किनारे से लगे हुए होते हैं।

(ii) अक्षीय (Axile)- इसमें जायांग द्वि या बहुअण्डपी (bi or multicarpellary)  बहुकोष्ठीय एवं युक्ताअण्डपी होता है। इसका बीजाण्डाशन केन्द्रीय होता है।

(ii) भित्तीय (Parietal) – जायांग द्वि से बहुअण्डपी (bi-multicarpellary)  lयुक्ताण्डपी तथा एककोष्ठीय होता है। इसमें बीजाण्ड परिधि पर दो निकटस्थ बोजा (placenta) में जुड़े होते हैं।

(iv) मुक्तस्तम्भीय (Free central)-इसमें जायांग द्वि से बहुअण्डपी, युक्ताण्डप तथा एककोष्ठीय (bi-multicarprellary, Syncarprous and unilocular) होता है। इसके बीजाण्ड केन्द्रीय स्तम्भ पर उत्पन्न होते हैं।

  • आधारीय (Basal)- इसमें एक या अधिक बीजाण्ड अण्डाशय के आधार पर लगे रहते हैं।
  • परिभित्तीय (Superficial or laminar)-परिभित्तीय में जायांग बहुअप्ड युक्ताण्डप, बहुकोष्ठीय (multicarpellary, Syncarpous, multilocular) होता है। वास्तव में बीजाण्डासन परिधि से अन्दर की ओर वृद्धि करता है जिससे यह सम्पूर्ण अन्त:सतह पर पाये जाते हैं।

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