DElEd 1st Semester Science 3rd 4th Science Short Question Answer Paper

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प्रश्न 10. परागकोष की संरचना एवं विकास बताइए।

उत्तर- परागकोष की संरचना एवं विकास- सामान्य रूप से एक द्विकोश परागकोश में चार परागधानियाँ होती हैं। परिपक्वावस्था के समय इनके मध्य को कोशिक भित्ति टूट जाती है जिससे इसमें केवल दो लम्बी परागधानियाँ रह जाती हैं। विकास से 5 परागकोश की समस्त कोशिकाएँ एक समान (homogeneous) तथा विभाज्यीय nmenstematic) होती हैं। एक कोशिका समूह के बाहर एक बाह्यत्वचा (epidermis) होती है। इस अविकसित परागकोश में बाह्यत्वचा में भीतर कोशिकाएँ चार कोणों में विभक्त हो जाती हैं। इनमें तेजी से विभाजन के कारण यह गोल से चार पाली वाली (four lobed) बन जातो हैं। इसकी चारों पालियों में विभाज्यीय कोशिकाएँ अन्य कोशिकाओं से बड़ी एवं सघन कोशिका द्रव्ययुक्त (densely cytoplasmic) हो जाती हैं। इनका केन्द्रक (nucleus) भी बड़ा होता है। ये कोशिकाएँ प्रपसु आरम्भक (archesporial initials) का काम करती हैं। इस अवस्था में इन कोशिकाओं के अलावा अन्य कोशिकाओं में विभाजन या तो रुक जाता है। या मध्यम पड़ जाता है। प्रत्येक आरकीस्पोरियल इनीशियल में परीक्लाइनल विभाजन (periclinal division) के फलस्वरूप बाह्यत्वचा की भाँति प्राथमिक भित्तोय कोशिका (primary parietal cell) तथा अन्दर की ओर प्राथमिक बीजाणु जननकोशिका (primary sporogenous) करती है। अन्तत: प्रत्येक बीजाणुजननकोशिका एक लघुबीजाणु मातृ कोशिका कहलाती है।

प्रश्न 11. लघुबीजाणु या परागकण की संरचना बताओ।

उत्तर-लघु बीजाणु- प्रत्येक परागकण एक अगुणित कोशिकीय संरचना होती है। जिसको बाक्लचोल मोटी, सख्त तथा अलंकृत होती है। इसका निर्माण स्पोरोपोलेनन से होती है। इसके भीतर पेक्टिन एवं सेल्युलोज की बनी एक पतली झिल्लीनुमा संरचना होती है जिसे अन्तःचोल (intine) कहते हैं। परागकण (pollen grain) के अंकुरण के समय परागनली इसी अन्त:चोल से निर्मित होती है। इन भित्तियों के अन्दर कोशिकाद्रव्य पाया जाता है तथा इस द्रव्य में एक बड़ा केन्द्रक होता है। लघुबीजाणु नरयुग्मकोभिद (male gametophyte) को पहली कोशिका होती है। । प्रत्येक कुल एवं पौधे में परागकणों की संरचना उसके बाह्यचोल के अलंकरण से पृथक् हो जाती है जिस कारण यह लक्षण वर्गीकरण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।। परागकणों का अध्ययन वर्तमान समय में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। एलर्जी तथा अपराध विज्ञान में भी इसका ज्ञान जरूरी माना जाता है। यह एक प्रकार का सम्पूर्ण विज्ञान है जिसे परमाणु विज्ञान कहा जाता है। इसके अन्तर्गत परागकणों का आकार, प्रकार तथा अलंकरण का अध्ययन किया जाता है।

लघुयुग्मकजनन (Microgametogenesis)-परागकणों से नर युग्मकों के बनने की क्रिया को जनन कहा जाता है। यह क्रिया सामान्यत: परागकोष में ही होती है अर्थात् परागकण जब परिपक्वास्था में ही परागकोष से पृथक् हो जाते हैं तब परागण होता है। इस क्रिया में सर्वप्रथम यह केन्द्रक एक किनारे करके एक बड़ी रिक्तिका (Vacuole) बनाता है। तत्पश्चात् इस कोशिका में सूत्री विभाजन के फलस्वरूप दो कोशिकाएँ बनती हैं, जिसमें एक छोटी जनन कोशिका तथा दूसरी बड़ी कायिक कोशिका होती है। दूसरा विभाजन जनन कोशिका में होता है जिसके फलस्वरूप दो नर युग्मक निर्मित होती हैं। इस स्तर पर परागकण तीन कोशिकीय (कायिक कोशिका तथा दो नर युग्मक) हो जाता है अर्थात् आवृतबीजी का लघुयुमकोद्भिद् तीन कोशिकीय होता है।

प्रश्न 12. बीजाण्ड के प्रकार बताइए।

उत्तर- बीजाण्ड के बीजाण्डासन पर बीजाण्डवृन्त से विभिन्न प्रकार से जुड़े रहने के आधार पर बीजाण्डद्वार तथा निभाग से बीजाण्डवृन्त की परस्पर स्थिति बदलती है। इसके अनुसार बीजाण्ड प्रायः छ: प्रकार के होते हैं

(i) आर्थोट्टोपस अथवा एट्रोपस (Orthotropous or Atropous)-इसमें बीजाण्डद्वार, निभाग तथा बीजाण्डवृन्त एक ही सीध में पाये जाते हैं; जैसे- पाइपरेसी व अरटीकेसी कुल के पौधे (ii) ऐनाटोपस (Anatropous)-इस प्रकार के बीजाण्ड इस प्रकार से उल्टे होते हैं।

कि बीजाण्डद्वार व बीजाण्डवृत्त आपस में समानान्तर हो जाते हैं तथा बीजाण्डद्वार तथा निभाग । एक सीध में होते हैं; उदाहरण के लिए, अधिकतर एकबीजपत्री व गेमोपेटली कुल के पौधों

(iii) हेमीएनाटोपस (Hemianatropous)-हेमीएनाटोपस बीजाण्ड में बीजाण्डवृन्त व

बीजाण्डद्वार के मध्य 90° का मुड़ाव पाया जाता है। इसमें बीजाण्डद्वार एवं निभाग एक सीध | में होते हैं; जैसे-रेननकुलस।

(iv) कम्पाइलोट्रोपस (Campylotropous)-इसमें बीजाण्ड का मुख्य हिस्सा इस प्रकार मुड़ता है कि बीजाण्ड एवं निभाग एक सीध में न पड़कर भ्रूणकोष (embryo sac) सामने (straight) होते हैं; जैसे–लेग्यूमिनेसी कुल के पौधे।।

(v) एम्फीट्रोपस (Amphitropous)-इसमें बीजाण्ड इस प्रकार मुड़ा होता है कि इसका भ्रूणकोष भी मुड़कर घोड़े की नाल के आकार (horse shoe shaped) का हो जाता है। इस प्रकार के बीजाण्ड ऐलिस्मेसी कुल के पौधों में पाये जाते हैं।

(vi) सिरसिनोट्रोपस (Circintropous)–सिरसिनोट्टोपस के बीजाण्ड का बीजाण्डवृन्त (funicle) वृद्धि करके 180° से 360° तक घूम जाता है। इस कारण बीजाण्डवृन्त बीजाण्ड को इस प्रकार घेरता है कि यह एक तीसरा अध्यावरण जैसा लगने लगता है; जैसेओपेन्शिऐसी कुल के पौधे।।

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