DElEd 1st Semester Science 3rd 4th Science Short Question Answer Paper

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प्रश्न 26. बीज किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ? इसकी संरचना को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-आवृतबीजी पौधों में द्विनिषेचन (Double Fertilization) के बाद बीजाण्ड बीज में परिवर्तित हो जाता है। बीज का निर्माण बीजाण्ड के परिवर्तन से होता है। बीजों के अंकुरण से नये पौधे का निर्माण होता है।

प्रकार–बीजपत्र के आधार पर बीज दो प्रकार का होता है

(i) एकबीजपत्री बीज-इस प्रकार के बीज में एक बीजपत्र होता है; जैसे—धान, मक्का, गेहूँ इत्यादि।

(ii) द्विबीजपत्री बीज- इस प्रकार के बीज में दो बीजपत्र पाये जाते हैं; जैसे–चना, मटर, अरहर आदि।

विभिन्न बीजों की आकृति भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। ये गोल, अण्डाकार, वृक्काकार आदि हो सकते हैं। बीजों का रंग भी अलग-अलग होता है। बीजों के बाहर एक आवरण पाया जाता है, जिसे बीजावरण कहा जाता है। यह दो परतों में पाया जाता है। बाहरी परत को बाह्य कवच एवं भीतरी परत को अन्त: कवच कहते हैं। बीज के एक सिरे पर छिद्र पाया जाता है जिसे बीजाण्डद्वार कहते हैं। बीजावरण के अन्दर भ्रूण पाया जाता है। बीजों के अन्दर भ्रूण को पोषण देने हेतु भ्रूणपोष (Endosperm) पाया जाता है।

प्रश्न 27. बीज के अंकुरण को स्पष्ट कीजिए।

अथवा।

बीजों के अंकुरण का नामांकित चित्र बनाइए।      (बी.टी.सी. 2017)

उत्तर- बीज तथा बीजों का अंकुरण- बीजों में भ्रूण सुषुप्तावस्था में होता है किन्तु जब बीज को उचित नमी, वायु तथा ताप मिलता है तो बीज के अन्दर का असक्रिय भ्रूण

चित्र-बीज का अंकुरण

सक्रिय हो जाता है तथा वृद्धि करना शुरू कर देता है और एक नया व  छोटा- सा पौधा बाहर. निकल जाता है। इसी क्रिया को अंकुरण कहा जाता है । अण्डद्वार के द्वारा जल शोषित कर  बीज फूल जाता है और बीज चोल, नर्म होकर फट जाता है । बीजपत्रों में अथवा भ्रूणपोष में उपस्थित संचित भोज्य पदार्थ एक घोल के रूप में परिवर्तित हो जाता है, जो वृद्धि करते हुए भ्रण द्वारा उपयोग में लाया जाता है। भ्रूण के आकार में वृद्धि के साथ मूलांकुर बीज से प्रथम  जड़ के रूप में बाहर निकलता है और नीचे मिट्टी की ओर बढ़ना शुरू कर तदुपरान्त प्रांकुर भी वृद्धि करके बाहर निकलकर ऊपर की ओर बढ़ता है और तना बनाता  है। यह  बीजन कहलाता है। बीजों के अंकुरण के लिए उचित नमी ऑक्सीजन तथा ताप की जरूरत होती है।

प्रश्न 28. परागकण किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार का होता है ?

अथवा       (डी.एल.एड, 2018)

परागकण क्या होता है ? यह कितने प्रकार का होता है ? उदाहरण देकर बताए ।

उत्तर- परागकोषों के परागकण बनने के पश्चात् आवश्यक है कि परागकण के नर केन्द्रक मादा केन्द्रक (अण्ड) तक पहुँचे। पुष्प के परागकोष से परागकणों के उसी || || दूसरे पौधे के किसी पुष्प के वर्तिकाग्र तक पहुँचने की क्रिया को परागण कहा जाता है। परागण की क्रिया दो प्रकार की होती है ।

| (1) स्वपरागण में एक पुष्प के परागकण उसी पुष्प के अथवा उसी पौधों के अन्य पण के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं। उदाहरण-सदाबहार, पैंजी, गुलमेंहदी, गंगफली व खड़ी थी।

(2) परपरागण में एक पुष्प के परागकण उसी जाति के किसी दूसरे पीथे पर लगे पण के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। परपरागण हेतु परागकणों को अन्य पुष्पों पर पहुँचाने के लिए किसी-न-किसी साधन की आवश्यकता होती है; जैसे-कीट, वायु, जल, पक्षी अथवा जन्तु।

उदाहरण- सूरजमुखी, गेंदा, साल्विया आदि में कीट परागण होता है। गे, धान, मक्का व सभी घास में वायु परागण पाया जाता है। सेमल, आम, बल आदि में गिलहरी । चिड़ियों द्वारा कदम व कचनार में चमगादड़ आर्किड्स में घोंघों द्वारा परागण होता है।

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