DElEd Semester 1 Science Short Question Answers Study Material Notes in Hindi

DElEd Semester 1 Science Short Question Answers Study Material Notes in Hindi

प्रश्न 7. पौधों में जड़ों के भागों के रूपान्तरण का वर्णन कीजिए।

उत्तर – 1 शुंकुरूप (Conical) – यह जड़ ऊपर से चौड़ा फिर नीचे से पतली होती जाती है, जैसे गाजर ( Daucus)।

कुम्भीरूप (Napiform) – इस प्रकी की जड़ो में ऊपर का भाग घड़े के समान फूला और निचना भाग एकदम पतला हो जाता है, जैसे शलजम (Brassica rapa)।

तुर्कुरूप (Fusiform) – तुर्कुरूप जड़ मूलाकुर के अलावा पौधे किसी और स्थान से विकसित होती है तब अपस्थानिक जड़ कहलाती है। अल्प आयु जड़ों के समाप्त होने पर भी अपस्थानिक जडे निकलती रहती है।

रेशेदार (Fibrous) – जडे बहुत पतली तथा जन्तु के समान होती है।

कंद गुच्छ ( Tuberous or fasciculated)- कन्द जड़ो में भोजन संचित होने के कारण ये फूल जाती हैं तथा गुच्छे बना लेती है, जैसे – शकरकन्द (Sweet Potato) एवं एस्पेरागस (Asparagus) आदि।

ग्रन्तिमय (Nodulose) – जिन जड़ो के सिरे फूल जाते हैं उन्हें ग्रन्थिमय जडे कहा जाता है, जैसे मेलीलोटस (Melilotus)।

जटा मूल (Stilt roots) – जब पर्व सन्धासे जडे निकलकर भूमि की ओर बढ़ती है तथा भूमि के अन्दर घुसकर रस्सीनुमा संरचना निर्मित कर लेती है तो वह जटा मूल जड़ कहलाती है, जैसे मक्का।

मणिरूपाकार (Beaded or Moniliform) – जब जड़ एक निश्चित अन्तर के बन्द मोती की भाँति फूलती है, तो वह मणिरूपाकार कहलाती है, जैसे वाइटिस (Vitus)>

आरोही मूल (Climbing roots) – आरोही जड़े पर्वसन्धियों पर निकलती हैं और आरोही को चढने में सहायता करती है, जेस मनी प्लाण्ट, मोन्स्टेरा आदि।

श्वसन जड़े (Respiratory roots) – ये जड़े लवणोद्भिद् पौधों में पायी जाती है। भूमि में जब हा (ऑक्सीजन) की कमी होती है तब श्वसन की क्रिया करने हेतु कुछ जड़े भूमि से ऊपर निकलकर श्वसन करने लगती है, इन्हें श्वसन जड़े कहा जाता है, जैसे – एवीसीनिया (Avicennia), जूसिया (Jussiea)।

स्तम्भ मूल (Prop roots)- जब जड़े शाखाओं से निकलकर भूमि में चली जाती है तथा पेड़ को स्तम्भ की भाँति दृढ़ता प्रदान करती हैं, तो वे स्तम्भ मूल जडे कहलाती है, जैसे – बरगद।

उपरिरोही जड़े (Epithytic roots) – पादपों में वायवीय जड़े मिलती हैं। इन जड़ों में वेलामन ऊतक पाया जाता है। यह वेलामन वायु से नमी सोख लेता है, जैसे आर्किड की जड़े ।

पर्णिल जड़े (Foliar Roots)- जब पत्तियों से जडे निकलती हैं तो यह जड़े पर्णिल जड़े कहलाती है, जैसे – पत्थरचट (Bryophyllum)।

प्रश्न 8. पुष्प के विभिन्न अंग बताइए।

उत्तर – पुष्प के विभिन्न अंग (Different Parts of Flower)। (1) बाह्रादलपुंज (Calyx) – यह पुष्प का सबसे बाहरी चक्र होता है। इसकी प्रत्येक इकाई को बाह्रादल (sepal) कहते हैं। यह कली ( bud) में जननांगों की सुरक्षा करने का कार्य करता है।

2. दलपुंज (Corolla)- यह दलपुंज का दूसरा चक्र है तथा यह बाह्रादलपुंज के भीतर की ओर होता है। यह रंगीन तथा सुन्दर होने के कारण इसका मुख्य कार्य परागण हेतु कीड़ों को आकर्षित करना है। इसकी इकाई को दल (petal) कहते हैं।

3. परिदलपुंज (Perianth) – जिन, पुष्पों में बाह्रादलपुंज तथा दलपुंज में अन्तर अस्पष्ट होता हैं, यह परिदलपुंज कहलाते हैं। इनकी इकाई को परिदल कहा जाता है। परिदपुंज रंगीन होने पर दलाभ (petaloid) या रंगहीन होने पर सेपलोइड अथवा बाह्रादलाभ (sepaloid) कहलाता हैं।

4. पुष्पवृन्त (Pedicel)- पुष्प जिस डंठल, तने अथवा शाखा से जुड़ा होता है, उसे पुष्पवृन्त कहते हैं।

5. पुष्पासन (Receptacle of Thalamus) – पुष्पवृन्द का अग्रस्थ भाग पुष्पासन होता है। इसके ऊपर पुष्प के अन्य बाग लगे हुए होते हैं।

6. जायांग (Gynoecium, Gyne Female) – यह पुष्प का चौथा अन्तिम चक्र है तथा सबसे सुरक्षित भीतरी भाग है जिसकी इकाई स्त्रीकेसर (carpel of pistil) या अण्डप कहलाती है,। यह पुष्प का मादा जननांग हैं जिसमें अण्डप (ovule or megasporphyll) तीनों बागों से मिलकर रबना है। इसके निचले भाग अण्डाशय, बीजाण्ड होते हैं।  अण्डाश्य से जुड़ी एक पतली नलीनुमा संरचना होती है जिसे वर्तिका कहा जाता है। इसके अन्त में वर्तिकाग्र (stigma) स्थित होता है।

प्रश्न 9. बीजाण्डन्यास से आप क्या समझते है? इसके प्रकार बताइए।

उत्तर 9. बीजाण्डन्यास से आशय (Meaning of Placentation)- बीजाण्ड का बीजाण्डासन पर थथा बीजाण्डासन का अण्डासय में हुआ अभिविन्यास बीजाण्डन्यास कहलात है। यह निम्न प्रकार के होते हैं-

  1. सीमान्त (Marginal) – सीमान्त में जायांग एकअण्डपी या बहुअण्डपा (mono-carpellary or multicarpellary) मुक्ताअण्डप होता है एवं इसमें बीजाण्ड कतार में एक किनारे से लगे हुए होते है।
  2. अक्षीय (Axile)- इसमें जायांग दि या बहुअण्डपी (bi or multicadrpllary), बहुकोष्ठीय एवं युक्ताअण्डपी होता है। इसका बीजाण्डासन केन्द्रीय होता है।
  3. भित्तीय (Parietal)- जायांग दि से बहुअण्डपी (bi – multicarpellary) युक्ताण्डपी तथा एककोष्ठीय होता है। इसमं बीजाण्ड परिधि पर दो निकटस्थ बीजाण्डासन में जड़े होते हैं।
  4. आधारीय (Basal)- इसमें एक या अधिक बीजाण्ड अण्डाशय के आधार पर लगे रहते हैं।
  5. परिभित्तीय (Superficial or laminar)- परिभित्तीय में जायांग बहुअण्डपी, युक्ताण्डप, बहुकोष्ठीय (multicarpellary, syncarpous, multilocular) होता है। वास्तव में बीजाण्डासन परिधि से अन्दर की ओर वृद्धि करता है जिससे यह सम्पूर्ण अन्त: सतह पर पाये जाते हैं।

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