DElEd Semester 1 Science Short Question Answers Study Material Notes in Hindi

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प्रश्न 23. बीज के अंकुरण को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – बीज तथा बीजों का अंकुरण – बीजों में भ्रूण सुषुप्तावस्था में होता है किन्तु जब बीज को उचित नमी, वायु तथा ताप मिलता है तो बीज के अन्दर का असक्रिय भ्रूण सक्रिए हो जाता है तथा वृद्धि करना शुरू कर देता है और एक नया व छोटा- सा पौधा बाहर निकल जाता है। इसी क्रया को अंकुरण कहा जाता है। अण्डद्वारा के द्वारा जल सोषित कर बीज फूल जाता है और बीज चोल, नर्म होतकर फट जाता है। बीजपत्रों में अथवा भ्रूणपोष में उपस्थित संचित भोज्य पदार्थ एक घोल के रूप में परिवर्तित हो जाता है, जो वृद्धि करते हुए भ्रूण द्वारा उपयोग में लाया जाता है। भ्रूण के आकार में वृद्धि के साथ मूलांकुर बीज से प्रथम जड़ के रूप में बाहर निकलता है और नीचे मिट्टी की और बढ़ना शुरू कर देता है। तदुपारान्त प्रांकुर भी वृद्धि करके बाहर निकलकर ऊपर की ओर बढ़ता है और तना बनाता है। यह बीजन कहलाता है। बीजों के अंकुरण के लिए उचित नमी ऑक्सीजन तथा ताप की जरूरत होता होती है।

प्रश्न 24. परागकण क्या होता है? यह कितने प्रकार का होता है? उदाहरण देकर बताइए।

उत्तर – परागकोणों के परागकण बनने के पश्चात् आवश्यक है कि परागकण के नर केन्द्रक मादा केन्द्रक (अण्ड) तक पहुँचे। पुष्प के परागकोष परागकणों के उसी पुष्प या दूसरे पौधे के किसी पुष्प के वर्तिकाग्र तक पहुँचने की क्रिया को परागण कहा जाता है। परागण की क्रिया दो प्रकार की होती है-

  1. स्वपरागण में एक पुष्प के परागकण उसी पुष्प के अथवा उसी पौधों के अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। उदाहरण –सदाबहार, पैंजी, गुलमेहदी, मूँगफली व खट्टी- बूटी
  2. परपरागण में एक पुष्प के परागकण उसी जाति के किसी दूसरे पौधे पर लगे पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। परपरागण हेतु परागकणों को अन्य पुष्पों पर पहुँचाने के लिए किसी न किसी साधन की आवश्यकता होती है, जैसे –कीट, वायु, जल, पक्षी अथवा जन्तु

उदाहरण – सूरजमुखी, गेंदा, साल्विया आदि में कीट परागण होता है। गेहूँ, धान मक्का व सभी घास में वायु परागण पाया जाता है। सेमल, आम, बबूल आदि में गिलहरी चिड़ियों द्वारा कदम व कचनार में चमगादड़ आर्किड्स में घोघों द्वारा परागण होता है।

प्रश्न 25. निषेचन क्या है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – निषेचन (fertilization)- बीजाण्ड के भ्रूणकोष में प्रवेश करने के पश्चात् पराग नलिका का शीर्ष गल जाता है तथा इसमें उपस्थित नलिका केन्द्रक भी लुप्त हो जाता है। दोनों नर युग्यम अब भ्रूणकोष के जीवद्रव्य में मुक्त हो जाते हैं तथा इसमें से एक अण्ड – कोशिका में घुसकर उसके केन्द्रक के साथ संलयित हो जाता है। इस प्रकार मुख्य निषेचन क्रिया खत्मक हो जाती है।

इससे युग्मजन (Zygote) का निर्माण होता है। यह युग्मजन आगे चलकर भ्रूण दूसरा नर, युग्यम दोनों ध्रुलीय केन्द्रकों (या दिगुणित केन्द्रक) के साथ संलयन करके एक दिगुणित केन्द्रक निर्मित करता है, प्राथमिक भ्रूणकोष केन्द्रक कहते हैं। इस क्रिया को त्रिक् संलयन कहते हैं। प्राथमिक भ्रूणकोष केन्द्रक बार बार विभाजित हो जाता है तथा इसके फलस्वरूप सभी केन्द्रकों के चारों ओर भित्तियाँ बन जाती है। इस प्रकार जो ऊतक बनता है, उसे भ्रूणपोष कहा जाता है। भ्रूणपोष में भोज्य पदार्थ एकत्रित हो जाता है। यह भ्रूण के परिवर्धन के समय उसे पोषण प्रदान करता है। दोहरा निषेचन होने के कारण ही आवृत्त बीजियों की यह क्रिया दिनिषेचन कहलाती है।

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