UPTET Paper Level 1 Samanya Hindi Bhasha Bodth Question Answer Paper


प्रश्न

  1. परम्परा का महत्व अक्षुण्ण है क्योंकि-
  • वह प्राचीन विचारों का जमाव है
  • उसमें मनुष्य का इतिहास सुरक्षित है
  • उसका आधार भविष्य की जीवन-पद्धति को रूप देता है
  • उसके साथ मनुष्य का भावात्मक लगाव होता है
  1. आधुनिकता से अभिप्राय है-
  • परम्परा का पूर्ण तिरस्कार
  • वर्तमान समय से जुङा होना
  • नए मूल्यों की खोज
  • परम्परा से अर्जित मूल्यों की नए संदर्भ में परख
  1. आधुनिकता एक गतिशील प्रक्रिया है क्योंकि-
  • समय गतिशील है
  • गति ही जीवन है
  • ज्ञान का विकास चिन्तन प्रक्रिया को निरन्तर बदलता रहता है
  • युग परिवर्तन की प्रक्रिया सतत गतिशील रहती है
  1. आधुनिकता और परम्परा में परस्पर-
  • अविच्छिन्न सम्बन्ध है
  • आकांक्षी सम्बन्ध है
  • अजर-मजर समबन्ध है
  • विशिष्ट सम्बन्ध है
  1. आधुनिकता की मूल अवधारणा बौद्धिक है क्योंकि-
  • आधुनिकता ज्ञान की अत्याधुनिक उपलब्धियों के सान्निध्य में विकसित होती है
  • यह आधुनिक बुद्धिजीवियों का विलास है
  • केवल शिक्षित वर्ग ही आधुनिक होता है
  • बुद्धि ही आधुनिकता का मार्ग प्रशस्त करती है

(5)

आज हम असमंजस में पङे हैं और यह निश्चय नहीं कर पाए हैं कि हम किस ओर चलेंगे  और हमारा ध्येय क्या है? स्वभावतः ऐसी अवस्था में हमारे पैर लङखङाते हैं. हमारे  विचार में भारत के लिए और सारे संसार के लिए सुख और शान्ति का एक ही रास्ता है और वह है अहिंसा और आत्मावाद का. अपनी दुर्बलता के कारण हम उसे ग्रहण न कर सके पर उसके सिद्धान्तों को तो हमें स्वीकार कर ही लेना चाहिए और उसके प्रवर्तन का इन्तजार करना चाहिए.यदि हम सिद्धान्त ही न मानेंगे तो उसके प्रवर्तन की आशा कैसे की जा सकती है? जहाँ तक मैनें महात्मा गाँधी जी के सिद्धान्त को समझा है, वह इसी आत्मवाद और अहिंसा के , जिसे वे सत्य भी कहा करते थे, मानने वाले और प्रवर्तक थे. उसे ही कुछ लोग आज गाँधीवाद का नाम भी दे रहे हैं. यधपि महात्मा गाँधी ने बार-बार यह कहा था कि , ‘‘ वे किसी नए सिद्धान्त या वाद के प्रवर्तक नहीं हैं और उन्होंने अपने जीवन में प्राचीन सिद्धान्तों को अमल कर दिखाने का यत्न किया.’’ विचार देखा जाए , तो जितने सिद्धान्त अन्य देशों , अन्य, काल और स्थितियों में भिन्न-भिन्न नामों और धर्मों से प्रचलित हुए हैं. सभी अन्तिम और मार्मिक अन्वेषण के बाद इसी तत्व अथवा सिद्धान्त में समाविष्ट पाए जाते हैं. केवल भौतिकवाद इनसे अलग है. हमें असमंजस की स्थिति से बाहर निकलकर निश्चय कर लेना  चाहिए कि हम अहिंसावाद, आत्मवाद और गाँधीवाद के अनुयायी और गाँधीवाद के अनुयायी और समर्थक हैं न कि भौतिकवाद के प्रेय और श्रेय में से हमें श्रेय को चुनना है. श्रेय ही हितकर है, भले ही वह कठिन और श्रमसाध्य हो. इसके विपरीत प्रेय आरम्भ में भले ही आकर्षक दिखाई दे, उसका अन्तिम परिणाम अहितकर होता है.

प्रश्न

  1. लेखक के मत में विश्व में सुख-समृद्धि और शान्ति स्थापित हो सकती है-
  • अहिंसा और आत्मावाद द्वारा
  • अहिंसा और अनात्मचवाद द्वारा
  • भौतिकवाद और आत्मवाद के समन्वय द्वारा
  • अनिश्चय और असमंजस की स्थिति से उबरकर
  1. हमारे पैर लङखङाते हैं,क्योंकि हम-
  • अशक्त एवं दुर्बल हैं
  • भौतिकवाद में आस्था रखते हैं
  • आत्मशक्ति में विश्वास नहीं रखते
  • लक्ष्यहीन और दिशाहीन हैं
  1. अहिंसा एवं सत्य के मार्ग में सबसे बङी बाधा है-
  • हिंसा का दुर्दम्य होना
  • असत्य मार्ग का सरल होना
  • मनुष्य की अपनी दुर्बलता
  • सत्य-मार्ग की दुर्गमता
  1. किसी सिद्धान्त को न मानने का सबसे बङा कुपरिणाम यह है कि-
  • उस सिद्धान्त का कभी क्रियान्वयन न होना
  • मनुष्य का सदैव असमंजस की स्थिति में पङे रहना
  • किसी ध्येय का निर्धारण न कर पाना
  • सुख और समृद्धि से वंचित रह पाना
  1. महात्मा गाँधी जिस सिद्धान्त के प्रवर्तक थे, वह सिद्धान्त है-
  • श्रेय और प्रेय
  • भौतिकता एवं अनात्मवाद
  • विज्ञान एवं अध्यात्मवाद
  • अहिंसा और आत्मवाद
  1. विश्व के प्रमुख वाद और विचारधाराएँ इस सिद्धान्त में समाहित हो जाती हैं-
  • करुणा में
  • अहिंसा में
  • सत्य में
  • विश्व शान्ति में
  1. हमें किस दुविधा से स्वयं को मुक्त करना चाहिए ?
  • हिंसा और अहिंसा की
  • गाँधीवाद और भौतिकवाद की
  • युद्ध और शान्ति की
  • आत्मवाद और अनात्मवाद की
  1. गाँधी जी का मानना था कि वे-
  • सत्य और अहिंसा के प्रवर्तक हैं
  • भौतिकवाद के संस्थापक हैं
  • प्राचीन सिद्धान्तों को आचरण में ढाल रहे हैं
  • प्राचीन सिद्धान्तों की व्याख्या कर रहे हैं
  1. उक्त अवतरण का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक हो सकता है-
  • जीवन का वास्तविक ध्येय
  • श्रेय और प्रेय
  • आत्मवात और भौतिकवाद
  • असमंजस और उससे मुक्ति
  1. भौतिकवाद से अभिप्राय उस सिद्धान्त से है जिसमें प्राधान्य रहता है-
  • सांसारिक सुख-साधनों का
  • प्रयोग और अन्वेषण का
  • पंचभूतों की उपासना का
  • विज्ञान सम्मत विचारधारा का

(6)

संस्कृति और सभ्यता —ये दो शब्द हैं और उनके अर्थ भी अलग-अलग हैं. सभ्यता मनुष्य का वह गुण है जिससे वह अपनी बाहरी तरक्की करता है. संस्कृति वह गुण है जिससे वह अपनी भीतरी उन्नति करता है. करुणा , प्रेम और परोपकार सीखता है.आज रेलगाङी , मोटर और हवाई जहाज, लम्बी-चौङी सङकों और बङे-बङे मकान, अच्छा भोजन और अच्छी पोषाक, ये सभ्यता की पहचान हैं और जिस देश में इनकी जितनी ही अधिकता है उस देश को हम उतना ही सभ्य मानते हैं. मगर संस्कृति उन सबसे कहीं बारीक चीज है.वह मोटर नहीं, मोटर बनाने की कला है. मकान मकान नहीं, बनाने की रुचि है. संस्कृति धन नहीं, गुण है. संस्कृति ठाठ –बाट नहीं विनय और विनम्रता है. एक कहावत है कि सभ्यता वह चीज है जो हमारे पास है,  लेकिन संस्कृति वह गुण है जो हममें छिपा हुआ है. हमारे पास घर होता है, कपङे –लत्ते होते हैं, मगर ये सारी चीजें हमारी सभ्यता के सबूत हैं, जबकि संस्कृति इतने मोटे तौर पर दिखलाई नहीं देती, वह बहुत ही सूक्ष्म और महीन चीज है और वह हमारी हर पसंद , हर आदत में छिपी है, मकान बनाना सभ्यता का काम है, लेकिन हम मकान का कौन –सा नक्शा पसंद करते हैं-यह हमारी संस्कृति बतलाती है. आदमी के भीतर काम, क्रोध लोभ, मद, मोह और मत्सर ये छः विकार प्रकृति के दिए जाएँ तो  आदमी इतना गिर जाए कि उसमें और  जानवर में कोई भेद न रह जाए. इसलिए आदमी इन विकारों पर रोक लगाता है इन दुर्गणों पर जो आदमी जितना ज्यादा काबू कर पाता है,उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है. संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढती है. तब उन दोनों की संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. इसलिए संस्कृति की दृष्टि से वह जाति या वह देश बहुत ही धनी समझा जाता है, जिसने ज्यादा से ज्यादा देशों या जातियों की संस्कृतियों से लाभ उठाकर अपनी संस्कृति का विकास किया हो.

प्रश्न

  1. सभ्यता का अभिप्राय है-
  • युग-युग की ऐश्वर्य कहानी
  • मनुष्य के स्वाधीन चिन्तन की गाथा
  • मानव के भौतिक विकास की विधायक गुण
  • मानव को कलाकार बना देने वाली विशेषता
  1. ‘संस्कृति’ का तात्पर्य है-
  • विशिष्ट जीवन-दर्शन से संतुलित जीवन
  • आनन्द मनाने का एक विशेष विधान
  • मानव की आत्मिक उन्नति का संवर्धक आन्तरिक गुण
  • हर-युग में प्रासंगिक विशिष्टता
  1. संस्कृति का मूल स्वभाव है कि वह-
  • एक समुदाय के जीवन में ही जीवित रह सकती है
  • आदान-प्रदान से बढती है
  • मनुष्य की आत्मा में विश्वास रखती है
  • मानव-मानव में भेद नहीं रखती
  1. मानव की मानवता इसी बात में निहित है कि वह-
  • अपने मन में विधमान विकारों पर नियन्त्रण पाने की चेष्टा करे
  • सभ्यता की ऊँचाइयों को पाने का प्रयास करे
  • अपनी संस्कृति को समृद्ध करने के लिए कटिबद्ध रहे
  • अपनी सभ्यता और संस्कृति का प्रचार करें
  1. संस्कृति सभ्यता से इस रूप में भिन्न है कि संस्कृति-
  • एक आदर्श विधान है और सभ्यता यथार्थ होती है
  • समन्वयमूलक है और सभ्यता नितांत मौलिक होती है
  • सभ्यता की अपेक्षा स्थूल और विशाद होती है
  • सभ्यता की अपेक्षा अत्यन्त सूक्ष्म होती है

(7)

यह एक सच्चाई है कि, निर्धनों और धनवानों दोनों में बेकार लोग होते हैं और परिश्रमी , निर्धन तथा कर्मशील धनवान भी होते हैं. अनेक भिखारी इतने सुस्त होते हैं कि जैसे उन्हें दस हजार की वार्षिक आय हो और कुछ अतिभाग्यशाली लोग अपने उद्देश्यों से भी अधिक व्यस्त होते हैं और बाहर बेकार की बातों में कोई रुचि नहीं रखते, क्योंकि व्यस्त और बेकार लोगों के बीच अन्तर समस्त पदों और स्थितियों के मनुष्यों में मानसिकता तथा अंतःप्रकृति से संबद्ध होता है. अमीरों और गरीबों दोनों में एक ऐसा कर्मशील परिश्रमी वर्ग होता है, जो निःशक्त और दुःखी रहता है. दोनों वर्गों में निकृष्टतर गलतफहमी उस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य से दूसरे वर्ग के मूर्खों के बारे में सोचने लगते हैं. यदि व्यस्त धनवान लोग अपने ही वर्ग के बेकार धनवान लोगों की निगरानी करें और उन्हें फटकारें, तो उनमें सब ठीक चलता रहेगा और यदि व्यस्त निर्धन बेकार निर्धनों पर ध्यान दें और उन्हें बुरा-भला कहें, तो भी उनमें सब ठीक ही चलता है, किंतु प्रायः सब एक-दूसरे के दोषों को जाँचते हैं. एक परिश्रमी सम्पन्न व्यक्ति बेकार भिखारी के प्रति आक्रोश करता है तथा एक सुव्यवस्थित कार्यशील , किंतु निर्धन व्यक्ति धनवानों के भोग-विलास के प्रति अनुदार होता है. निर्धनों में कोई आचारहीन व्यक्ति ही धनवानों को अपना सहज शत्रु मानता है और धनवानों में भी कोई लम्पट व्यक्ति ही निर्धनों के दोषों और गलतियों के लिए अपशब्द प्रयोग करता है.

प्रश्न

  1. परिश्रमी धनवान व्यक्ति भिखारी से चिढता है, क्योंकि-
  • वह भिक्षावृत्ति के अलावा कोई अन्य काम करने का प्रयास नहीं करता
  • भिक्षावृत्ति समाज के लिए अभिशाप है
  • कुछ भिखारी अपराधी प्रवृत्ति के हैं
  • भिखारी सामाजिक वातावरण को दूषित करते हैं
  1. मेहनती निर्धन मनुष्य को किस बात से चोट पहुँचती है?
  • धनवानों द्वारा किया जाने वाला निर्धनों का शोषण देखकर
  • धनवानों के भोग-विलास को देखकर
  • धनवानों द्वारा किए जाने वाले अभद्र व्यवहार को देखकर
  • धनवानों की कंजूसी को देखकर
  1. परिश्रमी धनवान और परिश्रमी निर्धन द्वारा किसकी उपेक्षा होती है ?
  • धनी वर्ग की
  • बेकार वर्ग की
  • मजदूर वर्ग की
  • निर्धन वर्ग की
  1. धनवानों और निर्धनों में कौनसे दो वर्ग होते हैं?
  • शोषक और शोषित वर्ग
  • सवर्ण और दलित वर्ग
  • पूंजीपति और श्रमिक वर्ग
  • कर्मठ-परिश्रमी और बेकार वर्ग
  1. धनवान और निर्धन के मध्य गलतफहमी उत्पन्न होने का मुख्य कारण यह है कि-
  • जब एक वर्ग के बुद्धिमान लोग, दूसरे वर्ग के मूर्खों के बारे में सोचने लगते हैं
  • जब मुर्ख लोग विदानों की निदां करने लगते हैं
  • धनवान व्यक्ति कम मजदूरी देकर अधिक काम लेना चाहता है
  • धनी व्यक्ति निर्धनों को रोजगार देने का प्रयास नहीं करते


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