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CTET UPTET Teaching Materials Aids Study Material in Hindi

CTET UPTET Teaching Materials Aids Study Material in Hindi

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CTET UPTET Teaching Materials Aids Question Answer in Hindi

UPTET Complete Study Material for Teaching Materials and Aids

CTET UPTET Teaching Materials Aids Study Material in Hindi
CTET UPTET Teaching Materials Aids Study Material in Hindi

CTET UPTET Teaching Materials and Aids (शिक्षक सामग्री एवं साधन) in Hindi 

शिक्षक सामग्री एवं साधन – छात्रों में पर्यावरण के अध्ययन के रुचि उत्पन्न करने व ज्ञान को स्थाई बनाने हेतु अध्यापक को अनेक प्रकार के साधनों का प्रयोग करना पड़ता है। अत: वे साधन जो अध्यापक की उद्देश्यपूर्ति में सहायक होते हैं, सहायक साधन या शिक्षण सहायक सामग्री कहलाते हैं। इनको श्रव्य-दृश्य साधनों का विशेष महत्व होता है। श्रव्य-दृश्य सामग्री के माध्यम से बालकों को पर्यावरण के विभिन्न सम्बन्धों तथा प्रत्ययों को समझने तथा सीखने में आसानी होती है, साथ ही, शिक्षक भी इनके माध्यम से अपने कार्य को अधिक प्रभावशाली बना सकता है। इस प्रकार पाठ को अधिक प्रभावशाली बना सकता है। इस प्रकार पाठ को अधिक रुचिकर, उपयोगी तथा प्रभावशाली बनाने के लिए श्रव्य-दृश्य सामग्री या शिक्षण-सहायक सामग्री का प्रयोग करना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है।

CTET UPTET Teaching Materials Aids Study Material in Hindi

एस.के.कोचर के अनुसार-श्रव्य-दृश्य साधन ऐसे सहायक उपाय हैं जिनके प्रयोग की बढ़ाकर एक शिक्षक छात्रों को भाव स्पष्ट कर सकता है तथा विभिन्न प्रत्ययों को समझाने, अर्थापन करने, गुण-दोषों का विमोचन करने, ज्ञान वृद्धि, रुचियों, चिन्तन शक्ति आदि को बढ़ाने में सहायता प्रदान कर सकता है।

श्रव्य-दृश्य सामग्री का महत्व एवं आवश्यकता (CTET UPTET Importance and Requirement of Audio-Visual Material in Hindi)

विज्ञान शिक्षण को अधिक रुचिकर तथा प्रभावशाली बनाने के लिए श्रव्य-दृश्य सामग्री या शिक्षक-सहायक सामग्री अत्यन्त आवश्यक है। इसके प्रयोग से शिक्षक अधिगम प्रक्रिया में बालकों का ध्यान आकर्षित करने में विशेष सहायता मिलती है। इसकी आवश्यकता एवं महत्व निम्न बिन्दुओं के माध्यम से और अधिक स्पष्ट की जा सकती है

  • श्रव्य-दृश्य सामग्री ऐसी अनुदेशनात्मक युक्तियाँ हैं जिनको सुना एवं देखा जा सकता है।
  • यह सामग्री ध्यान आकर्षित करने का उत्तम साधन है।
  • इनके प्रयोग से समय की बचत होती है तथा बालकों का अधिगम गहन और स्थाई हो जाता है।
  • इनके द्वारा छात्रों में रुचि उत्पन्न होती है।
  • इनके प्रयोग से मौखिक कार्य तथा अर्थहीन शब्दों का प्रयोग कम होता है।
  • इनके प्रयोग से बालकों को प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए बालक कक्षा में प्रदर्शन देखते हैं, उपकरणों का प्रयोग करते हैं, स्वयं प्रयोग करके देखते हैं तथा चार्ट, रेखाचित्र और मॉडल बनाते हैं।
  • इनके प्रयोग से कक्षा में शिक्षक का एकाधिकार कम होता है तथा कक्षा शिक्षण-अधिगम में विविधता आती है।
  • यह सीखने का अत्यधिक स्वाभाविक एवं सरल तरीका है।
  • यह छात्रों का ध्यान शिक्षण की ओर आकर्षित करती हैं और छात्रों की विभिन्न मानसिक क्रियाओं को उत्तेजित करती हैं।
  • इनके प्रयोग से शिक्षण की नीरसता को कम करके शिक्षण को अधिक रुचिकर बनाया जा सकता है।

श्रव्य-दृश्य साधनों का उपयुक्त चयन (CTET UPTET Proper Selection of Audio-Visual Instruments in Hindi)

दृश्य-श्रव्य साधनों की प्रभावकारिता उनके उचित चयन और प्रयोग पर निर्भर है। इन साधनों का चयन करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

  1. साधन वास्तविक एवं उद्देश्यपूर्ण साधन द्वारा प्रकरण का शुद्ध स्वरुप प्रस्तुत होना चाहिए। अध्ययन के कुछ क्षेत्रों में परिवर्तन बहुत तेजी से होते हैं अत: उनके सम्बन्ध में अद्यतन साधनों का चुनाव करने में सावधानी से काम लेना चाहिए।
  2. साधन अच्छी अवस्था में होने चाहिए टूटे हुए मॉडल, फटे हुए या जुड़े हुए नक्शे, चार्ट, चित्र, चटकी हुई स्लाइडों की उपयोगिता कम हो जाती है तथा विद्यार्थी के  हानिकारक एवं अशुद्ध सामान्यीकरण निर्धारित करने की कुशंका बनी रहती है। प्रयुक्त साधन नवीन चटक रंगों के एवं अच्छी अवस्था में होने चाहिए। श्रव्य साधनों की ध्वनि/आवाज स्पष्ट होनी चाहिए।
  3. साधन सरल होने चाहिए साधनों का चयन करते समय अध्यापक के ध्यान रखना चाहिए कि वे बच्चों के अनुभव व उनकी समझ के अनुकूल होने चाहिए। बच्चों के औसत स्तर के अनुकूल न होने पर वे कभी भी सहायक सिद्ध नहीं हो सकते अत: बच्चों के स्तर के अनुसार सहायक सामग्री प्रयुक्त करनी चाहिए।
  4. साधन अध्ययन के प्रकरण से सम्बन्धित होने चाहिए सहायक सामग्री सरल है, आकर्षक है परन्तु यदि प्रकरण से सम्बन्धित नहीं है या उसके विशिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति में असमर्थ है, तो इस प्रकार की सहायक सामग्री निरर्थक हो जाती है।
  5. साधन रुचिपूर्ण होने चाहिए यदि साधन रुचिपूर्ण होंगे तो बच्चों की एकाग्रता अपेक्षाकृत अधिक होगी और अधिगम भी अधिक होगा। अत: साधनों का चयन करते समय बच्चों की उम्र, आवश्यकता व योग्यता के आधार पर उनकी रुचि का ध्यान रखना चाहिए। अत्यधिक साधनों के अनावश्यक प्रयोग से बचना चाहिए।
  6. प्रयुक्त साधन विद्यार्थी के परिवेश के लिए परिचित होना चाहिए छात्रों के परिवेश से अपरिचित साधनों (जैसे-विदेशी फिल्में आदि) का प्रस्तुतीकरण रुचिपूर्ण होने पर भी अपरिचितता के कारण विद्यार्थी के लिए उपयोगी नहीं रहता।

    दृश्य सामग्री (CTET UPTET Visual Material in Hindi)

    दृश्य सामग्री का अभिप्राय उन साधनों से है जिनमें केवल दृश्य इन्द्रिय का प्रयोग होता है अर्थात् जिनमें ज्ञान मुख्यत: दृश्य इन्द्रिय के द्वारा प्राप्त होता है। प्रमुख दृश्य सामग्रियों का वर्णन नीचे किया जा रहा है-

    1. समाचार पत्र-पत्रिकाएँ शिक्षण में समाचार-पत्र तथा जनरल और पीरियोडिकल्स का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। प्रकृतिशील शिक्षा ने इनके महत्व को और अधिक बढ़ा दिया है। इनसे छात्रों का तत्कालीन घटनाओं एवं सूचनाओं की प्राप्ति होती है। ये पाठ्य पुस्तकों में संचित ज्ञानराशि को नवीन एवं पूर्ण बनाने के कार्य करती है।
    2. वास्तविक वस्तुएँ वास्तविक वस्तुओं से अभिप्राय मूल वस्तुओं से है। वास्तविक वस्तुएँ बालकों की इन्द्रियों को प्रेरणा देते हैं तथा उन्हें निरीक्षण एवं परीक्षण के अवसर प्रदान करके उनकी अवलोकन शक्ति का विकास करते हैं। बालक जब इन वास्तविक वस्तुओं को देखते हैं, छूते हैं, सुनते हैं तथा चखते हैं, तो उनकी क्रमश: द्राष्टिक, स्पर्श, श्रवण तथा रस प्रतिभाएँ निर्मित होती हैं। ये प्रतिभाएँ बालकों की कल्पना शक्ति को विकसित करने में सहयोग प्रदान करती है। अतएव पर्यावरण शिक्षा में वास्तविक वस्तुओं के प्रयोग से बालकों को अनेक प्रकार के अनुभव प्राप्त होते हैं।
    3. चार्ट एडगर डेल ने अपनी पुस्तक “आडियो विजुअल मेथड्स इन टीचिंग” में चार्ट की परिभाषा देते हुए बताया कि “चार्ट एक ऐसा दृश्य प्रतीक है जिसमें किसी विषयवस्तु को समझाने के लिए उसका संक्षेप प्रस्तुत किया गया हो, उसकी तुलना की गई हो, असमानता या विकल्प प्रस्तुत किया गया हो अथवा अन्य कोई गौण सहायता की गई हो।”
    4. चित्र चित्र छात्रों के सम्मुख विषयवस्तु को वास्तविक रुप में प्रस्तुत करने की चेष्टा करते हैं, इस प्रकार चित्र विषयवस्तु को यथार्थ बनाने की चेष्टा करते हैं। शैक्षिक श्रव्य/रेडियो कार्यक्रमों को कक्षा के लिए अधिक से अधिक कारगर बनाने और उऩका पूरा उपयोग करने में शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। किसी शैक्षिक कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या उसको कक्षा में पूरी तरह ग्रहण किया गया, उसका कितना उपयोग हुआ और बाद में उसके बारे में क्या कार्य हुआ।
    5. विज्ञप्ति पट्ट विज्ञप्ति पट्ट का शैक्षणिक महत्व बहुत अधिक है। दृश्य-श्रव्य शिक्षा के सम्बन्ध में जुलाई, 1956 में हुए अखिल भारतीय अध्यापक सम्मेलन में सुझाव दिया था कि विद्यार्थियों द्वारा विज्ञप्ति पट्ट के उपयोग को प्रोत्साहित करने के अध्यापकों को निम्नलिखित तीन सिद्धान्तों का पालन करना चाहिए
    • विज्ञप्ति पट्ट की सारी सामग्री विद्यार्थियों के रचनात्मक प्रयासों का परिणाम होनी चाहिए, भले ही ये प्रयास अध्यापक के सामान्य निर्देशन में किए गए हों। यह कार्य विद्यार्थियों द्वारा विद्यार्थियों के लिए एवं विद्यार्थियों का होना चाहिए।
    • विज्ञप्ति पट्ट के विविध तत्वों के विन्यास और निदर्शन में एक संगति और समरता सदा रहनी चाहिए।
    • विज्ञप्ति पट्ट कक्षा अथवा स्कूल की सार्वकालीन पत्रिका है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को उनसे सम्बन्धित प्रत्यक्ष जानकारी देना तथा ज्ञान के प्रति उनकी जिज्ञासा और इच्छा को जाग्रत करना है।
    1. श्यामपट्ट श्यामपट्ट का अर्थ है काला पट्ट तथा पट्ट का अर्थ लकड़ी के तख्तों के जुड़े हुए बड़े टुकड़े से है जिस पर काला रोगन करके उसे चाक से लिखने योग्य बना दिया जाता है।

    शिक्षा आयोग ने भारत में श्यामपट्ट नामक साधन की स्थिति का विवरण देते हुए लिखा है, “हमारे अधिकांश विद्यालयों में विशेषकर प्राथमिक स्तर पर आज भी एक अच्छे श्यामपट्ट, एक छोटे पुस्तकालय, आवश्यक नक्शे और चार्ट, और आवश्यक प्रदर्शन सामग्री, जैसे-बुनियादी साज-सामान और शिक्षण-साधनों का पूर्ण अभाव-सा ही है। शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार लाने केलिए प्रत्येक विद्यालय को इस प्रकार के बुनियादी साज-सामान और शिक्षण-साधनों का दिया जाना आवश्यक है। हमारी सिफारिश है कि प्रत्येक श्रेणी के विद्यालयों के लिए न्यून आवश्यक शिक्षण-साधनों एवं साज-सामान की सूचियाँ तैयार की जाएँ। हम यह भी सिफारिश करते हैं कि प्रत्येक विद्यालय को तुरन्त एक अच्छा श्यामपट्ट दिया जाए।”

    1. फ्लैनल पट्ट फ्लैनल पट्ट सर्वप्रथम ब्रिटेन और अमेरिका में प्रचलित हुआ। छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाने में यह जितना उपयोगी सिद्ध हुआ है उतनी ही ऊँची कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाने में भी। फ्लैनल पट्ट का उपयोग भी सामान्य श्यामपट्ट की भाँति पूरी चर्चा के दौरान किया जा सकता है, अन्तर केवल यह है कि श्यामपट्ट पर हमें चित्र, रेखाचित्र आदि खींचने पड़ते हैं, शब्द लिखने पड़ते हैं जबकि फ्लैनल पट्ट पर तैयार की हुई चीजें लगाकर दिखाते हैं और जरुरत पड़ने पर हटा लेते हैं।

    बच्चों के लिए हो या वयस्कों के लिए ज्यों-ज्यों कहानी अथवा चर्चा आगे बढ़े त्यों-त्यों यदि उसके अनुसार चित्र भी फ्लैनल पट्ट पर लगाए जाएँ तो वह अधिक सार्थक और आनन्दप्रद हो सकती है। ध्यान यही रखना होगा कि प्लैनल पट्ट पर दिखाए जाने वाले चित्र आकर्षक हों और इतने बड़े हों कि सभी उपस्थिति छात्रों को साफ-साफ दिखाई दें।

    1. प्रतिरुप या मॉडल किसी भी पदार्थ या मॉडल उसकी एक त्रिविमितीय अनुकृति होती है। वह सम्बन्धित पदार्थ के समान आकार का अथवा छोटा या बड़ा हो सकता है। मॉडलों के प्रकार निम्नलिखित हैं
      1. मापनीय मॉडल जब विषयवस्तु के स्पष्टीकरण हेतु प्रयुक्त किए जाने वाले मॉडल में माप का ध्यान रखा जाना आवश्यक होता है, तब वास्तविक वस्तु को दृष्टिगत करते हुए मॉडल का निर्माण करने के लिए पैमाने मानकर उसी अनुपात में उसका निर्माण किया जाता है।
      2. सरलीकृत मॉडल शिक्षण की ऐसी विषयवस्तु जिसके लिए तापमान के अनुसार ठीक पैमाना मानकर मॉडल नहीं बनाया जाता अर्थात् किसी वस्तु के बाह्रा आकार को सरलीकृत करके दिखाए जाने वाले मॉडल को सरलीकृत मॉडल कहा जाता है। उदाहरण के लिए आदर्श गाँव, पिछड़े गाँव का मॉडल, प्राकृतिक दृश्यों का मॉडल आदि। खाद्य-श्रृंखला, खाद्य-जाल का मॉडल बना सकते हैं।
      3. कटवाँ या अनुप्रस्थ काट वाले मॉडल ऐसी विषयवस्तु जिसके स्पष्टीकरण के लिए उसकी मूर्त वस्तु के भीतरी भाग को देखना आवश्यक हो, उसके लिए इस प्रकार के मॉडल्स प्रयुक्त किए जाते हैं।
      4. कार्यकारी मॉडल ऐसी विषयवस्तु जिसके शिक्षण के लिए उसकी मूर्त अवस्था की क्रियाविधि को स्पष्ट करना हो, उसके लिए कार्यकारी मॉडल उपयोगी होते हैं। उदाहरण के लिए, वोटिंग मशीन का मॉडल मतदान प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए उपयोगी है। वायु प्रदूषण प्रदर्शित करने के लिए, फैक्टरी का मॉडल बना कर उसमें चिमनी से धुँआ निकलता हुआ दिखाया जा सकता हैं।

 

श्रव्य-दृश्य सामग्री (CTET UPTET Audio-Visual Material in Hindi)

  1. रेडियों “विस्तृत वर्णन एवं नवीनतम ज्ञान की उत्पत्ति में रेडियो प्रसारण बहुत सहायक है।” इसके द्वारा छात्रों की स्मरण तथा अवलोकन शक्ति का विकास होता है तथा इसको सुनने का चाव छात्रों में अधिक होता है, इसीलिए इससे मनोरंजन तथा प्रेरणा दोनों ही मिलती हैं। इसके द्वारा भूगोल-सम्बन्धी विवरणों का विस्तार किया जा सकता है। यात्रा विवरण, स्वाभाविक ध्वनियाँ, मौसम सम्बन्धी सूचनाएँ आदि सरलाता से समझ में आ सकती हैं और बालक उनमें रुचि लेता है। इस साधन में यह कमी है कि छात्र केवल श्रोता बने बैठे रहते हैं, और कभी-कभी निष्क्रिय हो जाते हैं। पाठों की आवश्यकताओं को देखते हुए विवरण विस्तृत होने चाहिए।

विषयों का चुनाव पाठ्यक्रम तथा रोचकता के अनुसार होना चाहिए और विषयों के विशेषज्ञों द्वारा समय-समय पर भाषण दिलाने चाहिए, आकाशवाणी केन्द्री के पदाधिकारियों को पर्यावरण-शिक्षकों की राय समय-समय पर मिलती रहनी चाहिए।

  1. टेपरिकॉर्डर टेपरिकॉर्डर शिक्षक का एक सहायक साधन है। यह शिक्षक का स्थान नहीं ले सकता है। इसका उपयोग तभी किया जाना चाहिए जब इसकी सहायता से बालक किसी तथ्य या घटना को अच्छी तरह समझ सकते हों। टेप दो प्रकार के होते हैं-प्लास्टिक तथा कागज के। प्लास्टिक के टेप में, कागज के टेप की अपेक्षा अधिक व्यय होता है, परन्तु यह अधिक स्थाई होता है। साथ ही प्लास्टिक के टेप में आलेखन मिटाना अधिक सुगम होता है। टेपरिकॉर्डर की सहायता से बालकों के बोलने के ढंग में सुधार किया जा सकता है। पाश्चात्य देशों में इसकी सहायता से रेडियो के पाठों का कक्षा-शिक्षण में उपरोक्त ढंग से उपयोग किया जा सकता है।
  2. ग्रोमोफोन, ग्रोमोफोन रेडियो की भाँति शिक्षण का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। इसके माध्यम से छात्रों को भाषा की शिक्षा दी जा सकती है। इसके माध्यम से विषय के स्पष्टीकरण में सहायता मिलती है।
  3. दूरदर्शन टेलीविजन अथवा ‘दूरदर्शन’ का अर्थ है दूर से देखना। प्रसारण केन्द्र द्वारा वायु के माध्यम से संचारित टेलीविजन संकेत को उस क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति, जिसके पास टेलीविजन हो, ग्रहण कर सकता है। फिलिप्स इण्डिया लिमिटेड के रजत जयनत् समारोह के अवसर पर सन् 1955 में सबसे पहले बन्द परिपथ टेलीविजन का प्रदर्शन कलकत्ता, बम्बई, मद्रास और दिल्ली में किया गया था। नियमित रुप से टेलीविजन का आरम्भ भारत में 15 सितम्बर, 1959 से हुआ, जब राष्ट्रपति ने आकाशवाणी द्वारा दिल्ली में स्थापित प्रथम प्रायोगिक टेलीविजन केन्द्र का उद्घाटन किया।

कम्प्यूटर (CTET UPTET Comupter Study Material in Hindi)

कम्प्यूटर एक शानदार कैलक्यूलेटर है। इसके अतिरिक्त इसमें अत्यधिक सूचनाओं को संकलित करने, याद रखने तथा आवश्यकतानुसार प्रस्तुत करने की क्षमता होती है। इसके द्वारा संकलित सूचनाओं एवं समस्याओं को कम्प्यूटर-भाषा में परिवर्तित कर दिया जाता है। सम्पूर्ण तथ्यों का कम्प्यूटर-भाषा में अंकन किया जाता है।

विभिन्न कम्प्यूटर-भाषाओं (जैसे BASIC, COBOL, LOGO, FORTRAN आदि) का विभिन्न प्रयोजनों के लिए विकास किया जा चुका है। हमारी नई शिक्षा-नीति तथा आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) में कम्प्यूटर-प्रशिक्षण पर बहुत बल दिया गया है।

कम्प्यूटर द्वारा शिक्षण की विशेषताएँ-

  1. अधिक स्पष्ट जानकारी इन्टरनेट के माध्यम से अध्यापक किसी भी प्रकरण से सम्बन्धित अधिक से अधिक जानकारी सम्बन्धित चित्रों के साथ प्राप्त कर सकता है। इससे उसे अपने पाठ के प्रस्तुतीकरण में सहायता मिलती है।
  2. अपनी अध्ययन गति से सीखने का अवसर कम्प्यूटर पाठ योजना में बालक अपनी गति से व्यक्तिगत विभिन्नताओं के आधार पर सीख सकता है।
  3. वास्तविक अनुभव प्रदान करना कम्प्यूटर के माध्यम से चीजों की जिस तरह वे यथार्थ रुप में पायी जाती हैं उसी रुप में प्रस्तुत करने की अपार सम्भावनाएँ होती हैं अत: शिक्षण रोचक बन जाता है और छात्र के भावात्मक स्तर को प्रभावित करता है।
  4. प्रभावशाली शिक्षण कम्प्यूटर की सहायता से त्रिविम आकृतियाँ (3D) भी बनायी जा सकती हैं जिससे विषयवस्तु के प्रत्येक पहलू के स्पष्टीकरण में सहायता मिलती है तथा विभिन्न रंगों व ध्वनियों की सहायता से अधिकतम कल्पना शक्ति के विकास का अवसर मिलता है।

इन्टरनेट (CTET UPTET Internet Study Material in Hindi)

वस्तुत: इन्टरनेट विश्व के विभिन्न स्थानों पर स्थापित कम्प्यूटरों के नेटवर्क को टेलीफोन लाइन की सहायता से जोड़कर बनाया गया एक अन्तर्राष्ट्रीय सूचना मार्ग है, जिस पर एक स्थान से दूसरे स्थान तक सूचनाएँ पलक झपकते ही पहुँच जाती हैं।

सन् 1969 में अमेरिकी प्रतिरक्षा अनुसन्धान संस्थानों ने एक-दूसरे के साथ निरन्तर सम्पर्क बनाए रखने के लिए एक रक्षा परियोजना ‘एडवांस्क रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेन्सी’ (एरपा) बनाई। इस योजना के अन्तर्गत विभिन्न अमेरिकी प्रतिरक्षा संस्थानों के कम्प्यूटरों को ‘पैकेट स्विच नेटवर्क’ प्रौद्योगिकी की सहायता से एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया गया। इस योजना के अनुसार सूनाओं को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर अलग-अलग मार्गों के द्वारा अपने निश्चित स्थान पर भेजा जाता है। इसका लाभ यह होता है कि सदि किसी एक मार्गको शत्रु अवरुद्ध कर देता है तो भी सूचनाओं के टुकड़े दूसरे मार्ग से  अपने विर्दिष्ट स्थान पर पहुँच जाते है। इसी को इन्टरनेट का नाम दिया गया।

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