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UPTET Paper Level 1 Samanya Hindi Bhasha Bodh Question Answer Paper

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भाषा बोध

UPTET Paper Level 1 Class 1 to 5 Question Answer Sample Model Practice Set.

संस्कृति ऐसी चीज नहीं जिसकी रचना दस-बीस या सौ- पचास वर्षों में की जा सकती हो. हम जो कुछ भी करते हैं उसमें हमारी संस्कृति की झलक होती है. यहाँ तक कि हमारे उठने-बैठने, पहनने –ओढने ,     घूमने-फिरने और रोने-हँसने में भी हमारी संस्कृति की पहचान होती है.यधपि हमारा कोई भी एक काम हमारी संस्कृति का पर्याय नहीं बन सकता. असल में संस्कृति जिंदगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों जमा होकर उस समाज में छाया रहता है जिसमें हम जन्म लेते हैं. इसलिए जिस समाज में हम पैदा हुए हैं अथवा जिस समाज से मिलकर हम जी रहे हैं, उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है. यधपि अपने जीवन में हम जो संस्कार जमा करते हैं वह भी हमारी संस्कृति का अंग बन जाते हैं और मरने के बाद हम अन्य वस्तुओँ के साथ अपनी संस्कृति की विरासत भी अपनी संतानों के लिए छोङ जाते हैं. इसलिए संस्कृति वह चीज मानी जाती है जो हमारे सारे जीवन को सदियों के अनुभवों का हाथ है. यही  नहीं , ब्लकि संस्कृति हमारा पीछा जन्म जन्मान्तर तक करती है. अपने यहाँ एक साधारण कहावत है कि, ‘‘जिसका जैसा संस्कार है, उसका वैसा ही पुनर्जन्म भी  होता है.’’ जब हम किसी बालक या बालिका को बहुत तेज पाते हैं तब अचानक कह देते हैं कि यह पुनर्जन्म का संस्कार है. संस्कार या संस्कृति असल में शरीर का नहीं , आत्मा का गुण है, और जबकि सभ्यता की सामग्रियों से हमारा सम्बन्ध शरीर के साथ ही छूट जाता है, तब भी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के  साथ जन्म जन्मान्तर तक चलता रहता है.

प्रश्न

  1. इस अवतरण का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक है-
  • संस्कृति और उसकी व्यापकता
  • संस्कृति की व्यावहारिकता
  • सभ्यता और संस्कृति
  • संस्कृतिः आत्मा का गुण
  1. काली मोटी छपी पंक्ति से लेखक का आशय है  कि संस्कृति –
  • मानव के किसी एक काम का पर्याय नहीं हो सकती
  • जीवन-भर मानव की सोच को प्रभावित करती है
  • मानव को इस जीवन तथा भावी जीवन के लिए तैयार करती है
  • मानव के सभी कार्यों तथा व्यवहार को प्रभावित अथवा नियन्त्रित करती है
  1. संस्कृति की व्याप्ति है-
  • शरीर और आत्मा में
  • पूर्वजन्म और अगले जन्म में
  • जीवन के सभी क्रिया-कलापों में
  • मानव के उठने-बैठने , हँसने रोने में
  1. संस्कृति निरंतर प्रवाहमान है, क्योंकि-
  • संस्कृति जिंदगी को जीने की एक विशेष पद्धति है
  • हमारे जीवन के संस्कार भावी पीढी को संस्कृति के अंग रूप में मिलते हैं
  • काल कभी विश्राम नहीं लेता और संस्कृति देशकालातीत होती है
  • मनुष्य कभी अपनी संस्कृति को भूल नहीं पाता और उसके विकास के लिए सदैव प्रयास करता रहता है
  1. सभ्यता और संस्कृति में मूल अन्तर यह है कि सभ्यता –
  • सीमित है, संस्कृति असीमित
  • अनित्य है, संस्कृति नित्य
  • का प्रभाव परिमित है, संस्कृति का अपरिमित
  • का सम्बन्ध इहलोक से है, संस्कृति का परलोक से

(2)

कर्म के मार्ग पर आनन्दपूर्वक चलता हुआ उत्साही यदि अन्तिम फल तक न भी पहुँचे तो भी उसकी दशा कर्म न करने वाले की अपेक्षा अधिकतर अवस्थाओँ में अच्छी रहेगी.,क्योंकि एक तो कर्म-काल में उसका जो  जीवन बीता वह संतोष या आनन्द में बीता, उसके उपरांत फल की अप्राप्ति पर  भी उसे यह पछतावा न रहा कि मैंने प्रयत्न नहीं किया. फल पहले से कोई बना-बनाया पदार्थ नहीं होता. अनुकूल प्रयत्न-कर्म के अनुसार , उसके एक-एक अंग की योजना होती है. बुद्धि द्वारा पूर्णरूप से निश्चित की हुई व्यापार परम्परा का नाम ही प्रयत्न है. किसी मनुष्य के घर का कोई प्राणी बीमार है.  वह वैधों के यहाँ से जब तक औषधि ला-लाकर रोगी को देता जाता है और इधर-उधर दौङ-धूप करता जाता है तब तक उसके चित्त में जो सन्तोष रहता है-प्रत्येक नए उपचार के साथ जो आनन्द का  उन्मेष होता रहता है-यह उसे कदापि न प्राप्त होता, यदि वह रोता हुआ बैठा रहता. प्रयत्न की अवस्था में उसके जीवन का जितना अंश संतोष, आशा और उत्साह में बीता, अप्रत्न की दशा में उतना ही अंश केवल शोक और दुःख में कटता. इसके अतिरिक्त रोगी के न अच्छा होने की दशा में भी वह आत्म-ग्लानि के उस कठोर दुःख से बचा रहेगा जो उसे जीवन-भर यह सोच-सोच कर होता कि मैंने पूरा प्रयत्न नहीं किया.

कर्म में आनन्द अनुभव करने वालों ही का नाम कर्मण्य है. धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनन्द भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फलस्वरूप लगते हैं. अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करते हुए चित्त में जो  उल्लास और तुष्टि होती है वही लोकोपकारी कर्म –वीर का सच्चा सुख है. उसके लिए सुख है. उसके लिए सुख तब तक के लिए रुका नहीं रहता तब तक कि फल प्राप्त न हो जाए, बल्कि उसी समय से थोङा-थोङा करके मिलने लगा है जब से वह कर्म की ओर हाथ बढाता है.

प्रश्न

  1. लेखक के अनुसार कर्म-काल में व्यक्ति का जीवन कैसा होता है ?
  • व्यस्त
  • परिश्रमपूर्ण
  • विश्रान्त
  • संतोष या आनन्दपूर्ण
  1. असफलता की दशा में कर्मठ व्यक्ति को पछतावा क्यों नहीं होता?
  • वह भविष्य में सफलता के प्रति आशान्वित रहता है
  • उसे अपने किए हुए कार्य में कमियों का ज्ञान हो जाता है
  • उसे यह पछतावा नहीं रहता कि मैंने प्रयत्न नहीं किया
  • वह जानता है कि प्रयत्न मन लगाकर नहीं किया गया
  1. लेखक के अनुसार ‘प्रयत्न’ किसे कहते हैं ?
  • किसी कार्य को करने के लिए किए गए शारीरिक परिश्रम को प्रयत्न कहते हैं
  • बुद्धि द्वारा पूर्णरूप से निश्चित की हुई व्यापार परम्परा को प्रयत्न कहते हैं
  • किसी भी कार्य –सिद्धि के लिए की गई कामना को प्रयत्न कहते हैं
  • किसी भी कार्य-सिद्धि के लिए किए गए वैचारिक श्रम को प्रयत्न कहते हैं
  1. प्रयत्न की अवस्था में समय कैसे व्यतीत होता है?
  • संतोष, आशा और उत्साह में व्यतीत होता है
  • असंतोष, शोक और दुःख में व्यतीत होता है
  • चिंता और उदिग्नता में व्यतीत होता है
  • थकान और व्यस्तता में व्यतीत होता है
  1. निम्नलिखित में से ‘कर्मण्य’ कौन है?
  • निरन्तर कार्य में लगा रहने वाला
  • कर्म में आनन्द का अनुभव करने वाला
  • केवल शारीरिक श्रम करने वाला
  • केवल मानसिक श्रम करने वाला
  1. लोकोपकारी कर्मवीर का सच्चा सुख क्या है?
  • उसे सम्मान मिलता है
  • सत्कर्मों से चित्त को उत्साह और सन्तुष्टि मिलती है
  • लोग उसका गुणवान करते हैं
  • उसे धन , यश और प्रतिष्ठा मिलती है
  1. उपर्युक्त गधांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक कौन–सा है?
  • कर्म का महत्व
  • कर्म और उत्साह
  • सत्कर्म का सुख
  • कर्मवीर

(3)

प्रेमचन्द की जो सबसे बङी शक्ति है, वह अधिकांश आलोचकों ने पहचानी ही नहीं है. वह है-आचरण की भूमि प्रेमचन्द के जीवन चित्रण और आचरण में पूर्ण साम्य है. उनका समस्त साहित्य उनकी आत्माभिव्यक्ति है, असंख्य पात्रों में उनकी अपनी सात्विकता चरितार्थ ही है. अपने ही नैतिक, राष्ट्रीय और भावुक व्यक्तित्व को अनेकानेक कल्पित नर-नारियों के चरित्र में बाटँकर वे अपने साहित्य-जगत पर छा गए हैं. उनके लिए साहित्य आचरण से स्वतन्त्र कला-कर्म मात्र नहीं है. उनके पात्रों की दया, क्षमा , ममता, ओजस्विता और बलिदानशीलता प्रेमचन्द की अपनी अनुभूति है. सामग्रिक संपृक्ति का ऐसा उदाहरण विरले ही मिलेगा.प्रेमचन्द के प्रत्येक पात्र पर उनके व्यक्तित्व तथा आचरण की छाप है. वह अपने पात्रों का जीवन जिए हैं और उन्होंने अपने आचरण की सम्यकता और पवित्रता का झीना आवरण अपनी कला सृष्टि पर डाल दिया है. इसलिए वे तटस्थ कलाकार नहीं कहे जा सकते. वे प्रसिद्धि हैं. अपने युग-मानव से क्षण-प्रतिक्षण सृंपक्त हैं. प्रेमचन्द के चरित्र की पवित्रता ही उनके पात्रों को पवित्रतावादी बना देती  है. आचरण के द्वारा ही हम जीवन से संपृक्त हैं और जिस कलाकार के पास आचरण का बल नहीं है, वह पाठकों के अन्तर्मन में प्रवेश प्राप्त करने का अधिकारी नहीं होता. जिस कलाकार की कलम से एक भी अनैतिक वाक्य नहीं निकला, दैहिक आवेश का अक भी स्पंदन नहीं उभरा, वासना कटुता और घृणा से जिसका कोई पात्र विषाक्त नहीं हुआ, उस कलाकार की जीवन-चेतना हमारी उदात्त नैतिक चेतना का पर्याय ही होगी. प्रेमचन्द्र नीति के कलाकार हैं, अनीति के कलाकार नहीं हैं,,, क्योंकि वे जीवन के शिल्पी हैं.

प्रश्न

  1. आलोचकों द्वारा प्रेमचन्द की कौनसी शक्ति अनचीन्ही रह गई है ?
  • जीवन चित्रण की
  • जीवन संपृक्ति की
  • लेखकीय तटस्थता की
  • आचरण की
  1. प्रेमचन्द के उपन्यासों में उनकी आत्माभिव्यक्ति दृष्टिगत होती है क्योंकि-
  • प्रेमचन्द उपन्यास को जीवन-चित्रण मानते हैं
  • वे सात्विक जीवन जीने के पक्षधर हैं
  • उनके पात्र उनके व्यक्तित्व को वहन करते हैं
  • उनके पात्र वर्गगत न होकर व्यक्तिगत हैं
  1. प्रेमचन्द का कला विषयक सिद्धान्त था-
  • कला कला के लिए
  • कला मनोरंजन के लिए
  • कला तटस्थता के लिए
  • कला नैतिकता के लिए
  1. प्रेमचन्द अपने साहित्य में ‘स्व’ की अभिव्यक्ति करते हैं-
  • पात्रों के माध्यम से
  • कथानक के माध्यम से
  • संवादों के माध्यम से
  • भाषा-शैली के माध्यम से
  1. प्रेमचन्द को नीति का कलाकार माना जा सकता है, क्योंकि वे-
  • साहित्य में आत्माभिव्यक्ति पर बल देते हैं
  • उदात्त नैतिक चेतना के उपन्यासकार हैं
  • जीवन में सात्विकता को महत्व देते हैं
  • आचरण की सभ्यता के अनुसर्त्ता हैं

(4)

सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि परम्परा अब तक के सभी आचार-विचारों का जमाव है. सभी पुरानी बातें परम्परा कह दी जाती हैं. जबकि सत्य यह है कि परम्परा भी एक गतिशील प्रक्रिया की देन है. परम्परा का शब्दार्थ है एक से दूसरे को , दूसरे से तीसरे को दिया जाने वाला क्रम पर परम्परा से हमें समूचा अतीत नहीं प्राप्त होता , उसका निरन्तर, निखरता, छँटता,बदलता रूप प्राप्त होता है. उसके आधार पर हम आगे की जीवन-पद्धति को रूप देते हैं. इस परम्परा का अर्थ विशुद्ध अतीत नहीं है. वह एक निरन्तर गतिशील जीवन्त प्रक्रिया है. खङा पैर परम्परा है और चलता पैर आधुनिकता.

इसी के समानान्तर आधुनिकता का अर्थ क्या केवल समय सापेक्ष है. इस समय जो कुछ है,  क्या वही आधुनिकता ऐसा नहीं है. हम बराबर देखते हैं कि कुछ बातें इस समय ऐसी हैं जो आधुनिक नहीं हैं, बल्कि मध्यकालीन हैं. वस्तुतः मनुष्य ने अनुभवों द्वारा जिन गहनीय मूल्यों को उपलब्ध किया है, उन्हें नए संदर्भ में देखने की दृष्टि आधुनिकता है. यह एक गतिशील प्रक्रिया है. संदर्भ बदल रहे हैं क्योंकि नई जानकारियों से नए साधन और नए उत्पादन सुलभ होते जा रहे हैं. नई सामग्रियों और नए कौशल नवीन संदर्भों की रचना कर रहे हैं. आधुनिकता ज्ञान की अत्याधुनिक उपलब्धियों के आलोक में रूप ग्रहण करने का प्रयास करती है, इसीलिए बौद्धिक है.

कोई भी आधुनिक विचार आसमान में नहीं पैदा होता है. सबकी जङ परम्परा में गहराई तक गई हुई है. सुन्दर से सुन्दर फूल यह दावा नहीं कर सकता कि वह पेङ से भिन्न होने के कारण उससे एकदम अलग है. कोई भी पेङ दावा नहीं कर सकता कि वह मिट्टी से भिन्न होने के कारण उससे एकदम अलग है. इसी प्रकार कोई भी आधुनिक विचार यह दावा नहीं कर सकता  कि वह परम्परा से कटा हुआ है. कार्यकारण के रूप में , आधार-आधेय के रूप में परम्परा की एक श्रृंखला अतीत में गहराई तक बहुत गहराई तक गई हुई है.

प्रश्न

  1. परम्परा का महत्व अक्षुण्ण है क्योंकि-
  • वह प्राचीन विचारों का जमाव है
  • उसमें मनुष्य का इतिहास सुरक्षित है
  • उसका आधार भविष्य की जीवन-पद्धति को रूप देता है
  • उसके साथ मनुष्य का भावात्मक लगाव होता है
  1. आधुनिकता से अभिप्राय है-
  • परम्परा का पूर्ण तिरस्कार
  • वर्तमान समय से जुङा होना
  • नए मूल्यों की खोज
  • परम्परा से अर्जित मूल्यों की नए संदर्भ में परख
  1. आधुनिकता एक गतिशील प्रक्रिया है क्योंकि-
  • समय गतिशील है
  • गति ही जीवन है
  • ज्ञान का विकास चिन्तन प्रक्रिया को निरन्तर बदलता रहता है
  • युग परिवर्तन की प्रक्रिया सतत गतिशील रहती है
  1. आधुनिकता और परम्परा में परस्पर-
  • अविच्छिन्न सम्बन्ध है
  • आकांक्षी सम्बन्ध है
  • अजर-मजर समबन्ध है
  • विशिष्ट सम्बन्ध है
  1. आधुनिकता की मूल अवधारणा बौद्धिक है क्योंकि-
  • आधुनिकता ज्ञान की अत्याधुनिक उपलब्धियों के सान्निध्य में विकसित होती है
  • यह आधुनिक बुद्धिजीवियों का विलास है
  • केवल शिक्षित वर्ग ही आधुनिक होता है
  • बुद्धि ही आधुनिकता का मार्ग प्रशस्त करती है

(5)

आज हम असमंजस में पङे हैं और यह निश्चय नहीं कर पाए हैं कि हम किस ओर चलेंगे  और हमारा ध्येय क्या है? स्वभावतः ऐसी अवस्था में हमारे पैर लङखङाते हैं. हमारे  विचार में भारत के लिए और सारे संसार के लिए सुख और शान्ति का एक ही रास्ता है और वह है अहिंसा और आत्मावाद का. अपनी दुर्बलता के कारण हम उसे ग्रहण न कर सके पर उसके सिद्धान्तों को तो हमें स्वीकार कर ही लेना चाहिए और उसके प्रवर्तन का इन्तजार करना चाहिए.यदि हम सिद्धान्त ही न मानेंगे तो उसके प्रवर्तन की आशा कैसे की जा सकती है? जहाँ तक मैनें महात्मा गाँधी जी के सिद्धान्त को समझा है, वह इसी आत्मवाद और अहिंसा के , जिसे वे सत्य भी कहा करते थे, मानने वाले और प्रवर्तक थे. उसे ही कुछ लोग आज गाँधीवाद का नाम भी दे रहे हैं. यधपि महात्मा गाँधी ने बार-बार यह कहा था कि , ‘‘ वे किसी नए सिद्धान्त या वाद के प्रवर्तक नहीं हैं और उन्होंने अपने जीवन में प्राचीन सिद्धान्तों को अमल कर दिखाने का यत्न किया.’’ विचार देखा जाए , तो जितने सिद्धान्त अन्य देशों , अन्य, काल और स्थितियों में भिन्न-भिन्न नामों और धर्मों से प्रचलित हुए हैं. सभी अन्तिम और मार्मिक अन्वेषण के बाद इसी तत्व अथवा सिद्धान्त में समाविष्ट पाए जाते हैं. केवल भौतिकवाद इनसे अलग है. हमें असमंजस की स्थिति से बाहर निकलकर निश्चय कर लेना  चाहिए कि हम अहिंसावाद, आत्मवाद और गाँधीवाद के अनुयायी और गाँधीवाद के अनुयायी और समर्थक हैं न कि भौतिकवाद के प्रेय और श्रेय में से हमें श्रेय को चुनना है. श्रेय ही हितकर है, भले ही वह कठिन और श्रमसाध्य हो. इसके विपरीत प्रेय आरम्भ में भले ही आकर्षक दिखाई दे, उसका अन्तिम परिणाम अहितकर होता है.

प्रश्न

  1. लेखक के मत में विश्व में सुख-समृद्धि और शान्ति स्थापित हो सकती है-
  • अहिंसा और आत्मावाद द्वारा
  • अहिंसा और अनात्मचवाद द्वारा
  • भौतिकवाद और आत्मवाद के समन्वय द्वारा
  • अनिश्चय और असमंजस की स्थिति से उबरकर
  1. हमारे पैर लङखङाते हैं,क्योंकि हम-
  • अशक्त एवं दुर्बल हैं
  • भौतिकवाद में आस्था रखते हैं
  • आत्मशक्ति में विश्वास नहीं रखते
  • लक्ष्यहीन और दिशाहीन हैं
  1. अहिंसा एवं सत्य के मार्ग में सबसे बङी बाधा है-
  • हिंसा का दुर्दम्य होना
  • असत्य मार्ग का सरल होना
  • मनुष्य की अपनी दुर्बलता
  • सत्य-मार्ग की दुर्गमता
  1. किसी सिद्धान्त को न मानने का सबसे बङा कुपरिणाम यह है कि-
  • उस सिद्धान्त का कभी क्रियान्वयन न होना
  • मनुष्य का सदैव असमंजस की स्थिति में पङे रहना
  • किसी ध्येय का निर्धारण न कर पाना
  • सुख और समृद्धि से वंचित रह पाना
  1. महात्मा गाँधी जिस सिद्धान्त के प्रवर्तक थे, वह सिद्धान्त है-
  • श्रेय और प्रेय
  • भौतिकता एवं अनात्मवाद
  • विज्ञान एवं अध्यात्मवाद
  • अहिंसा और आत्मवाद
  1. विश्व के प्रमुख वाद और विचारधाराएँ इस सिद्धान्त में समाहित हो जाती हैं-
  • करुणा में
  • अहिंसा में
  • सत्य में
  • विश्व शान्ति में
  1. हमें किस दुविधा से स्वयं को मुक्त करना चाहिए ?
  • हिंसा और अहिंसा की
  • गाँधीवाद और भौतिकवाद की
  • युद्ध और शान्ति की
  • आत्मवाद और अनात्मवाद की
  1. गाँधी जी का मानना था कि वे-
  • सत्य और अहिंसा के प्रवर्तक हैं
  • भौतिकवाद के संस्थापक हैं
  • प्राचीन सिद्धान्तों को आचरण में ढाल रहे हैं
  • प्राचीन सिद्धान्तों की व्याख्या कर रहे हैं
  1. उक्त अवतरण का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक हो सकता है-
  • जीवन का वास्तविक ध्येय
  • श्रेय और प्रेय
  • आत्मवात और भौतिकवाद
  • असमंजस और उससे मुक्ति
  1. भौतिकवाद से अभिप्राय उस सिद्धान्त से है जिसमें प्राधान्य रहता है-
  • सांसारिक सुख-साधनों का
  • प्रयोग और अन्वेषण का
  • पंचभूतों की उपासना का
  • विज्ञान सम्मत विचारधारा का

(6)

संस्कृति और सभ्यता —ये दो शब्द हैं और उनके अर्थ भी अलग-अलग हैं. सभ्यता मनुष्य का वह गुण है जिससे वह अपनी बाहरी तरक्की करता है. संस्कृति वह गुण है जिससे वह अपनी भीतरी उन्नति करता है. करुणा , प्रेम और परोपकार सीखता है.आज रेलगाङी , मोटर और हवाई जहाज, लम्बी-चौङी सङकों और बङे-बङे मकान, अच्छा भोजन और अच्छी पोषाक, ये सभ्यता की पहचान हैं और जिस देश में इनकी जितनी ही अधिकता है उस देश को हम उतना ही सभ्य मानते हैं. मगर संस्कृति उन सबसे कहीं बारीक चीज है.वह मोटर नहीं, मोटर बनाने की कला है. मकान मकान नहीं, बनाने की रुचि है. संस्कृति धन नहीं, गुण है. संस्कृति ठाठ –बाट नहीं विनय और विनम्रता है. एक कहावत है कि सभ्यता वह चीज है जो हमारे पास है,  लेकिन संस्कृति वह गुण है जो हममें छिपा हुआ है. हमारे पास घर होता है, कपङे –लत्ते होते हैं, मगर ये सारी चीजें हमारी सभ्यता के सबूत हैं, जबकि संस्कृति इतने मोटे तौर पर दिखलाई नहीं देती, वह बहुत ही सूक्ष्म और महीन चीज है और वह हमारी हर पसंद , हर आदत में छिपी है, मकान बनाना सभ्यता का काम है, लेकिन हम मकान का कौन –सा नक्शा पसंद करते हैं-यह हमारी संस्कृति बतलाती है. आदमी के भीतर काम, क्रोध लोभ, मद, मोह और मत्सर ये छः विकार प्रकृति के दिए जाएँ तो  आदमी इतना गिर जाए कि उसमें और  जानवर में कोई भेद न रह जाए. इसलिए आदमी इन विकारों पर रोक लगाता है इन दुर्गणों पर जो आदमी जितना ज्यादा काबू कर पाता है,उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है. संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढती है. तब उन दोनों की संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं. इसलिए संस्कृति की दृष्टि से वह जाति या वह देश बहुत ही धनी समझा जाता है, जिसने ज्यादा से ज्यादा देशों या जातियों की संस्कृतियों से लाभ उठाकर अपनी संस्कृति का विकास किया हो.

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